पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२८० पञ्चदशी कि अपने प्रारब्ध कर्म से ] जकड़ा हुआ तू जो कुछ करना नहीं भी चाहता है उसे भी मोह के कारण बेबस होकर करेगा [ इससे यही सिद्ध होता है कि अनिच्छा प्रारब्ध भी मानना ही चाहिये । ] नानिच्छन्तो न चेच्छन्तः परदाक्षिण्यसंयुताः । सुखदुःख्वे मजन्त्येतत् परेच्छापूर्वकर्म हि ॥१६२॥ न तो चाहते ही हैं, और न न चाहते ही हैं, किन्तु दूसरे को खुश करने के विचार में फंस कर दूसरे की प्रीति के लिये ही सुख दुःख भोगा करते हैं। यों सुखादि भोग देने वाला 'परेच्छाप्रारब्ध' होता है । दोष देख लेने पर भी ऐसे प्रारब्ध का परिहार हो नहीं सकता । उस प्रारब्ध में जो कि इच्छा को उत्पन्न करने का सामर्थ्य है उस को कोई हटा नहीं सकता । ] कथं तर्हि किमिच्छन्नित्येवमिच्छा निषिध्यते । नेच्छानिषेधः किन्त्विच्छाबाधो भर्जितबीजवत् ॥१६३॥ उक्त रीति से जब तत्त्वज्ञानी लोग भी इच्छा करते हैं तब फिर "आत्मानं चेद्विजानीयात्"(बृ०४-४।२)इस श्रुति में किमिच्छन् किस वस्तु की इच्छा से— इस पद से इच्छा का अभाव क्यों कहते हो ? इसका समाधान यह है कि—यह इच्छा का निषेध नहीं है। किन्तु यह तो भुने हुए बीज की तरह इच्छा के बाध का वर्णन है [ उसका तात्पर्य यही है कि—ज्ञानी में इच्छा रहती तो है । परन्तु वह निर्वीर्य होती है । भुने हुए बीज में जैसे उत्पादन का सामर्थ्य नहीं रहता,इसी प्रकार ज्ञानी की इच्छा से समर्थ प्रवृत्ति पैदा नहीं होती ] ।