भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 301

तृप्तिदीपप्रकरणम् २८१ भर्जितानि तु बीजानि सन्त्यकार्यकराणि च । विद्वदिच्छा तथेष्टव्याऽसत्वबोधान्न कार्यकृत् ॥१६४॥ जैसे भुने हुए बीज,स्वरूप से बने तो रहते हैं,परन्तु वे अङ्कुर आदि कार्यों को उत्पन्न नहीं कर सकते । इसी प्रकार विद्वान् की इच्छा को मान लो—स्वयं चाहे विद्यमान् भी रहती हो, परन्तु जिन पदार्थों की इच्छा वह करता है, असत् समझ लेने से, उन पदार्थों की तो बाधा हो चुकी है, फिर ज्ञानी की वह इच्छा व्यसन आदि कार्यों को उत्पन्न नहीं कर सकती । [उसकी वह इच्छा मरी हुई होती है] । दग्धबीजमरोहेऽपि भक्षणायोपयुज्यते । विद्वदिच्छाप्यल्पभोगं कुर्यान्न व्यसनं बहु ॥१६५॥ भुना हुआ बीज यद्यपि उगता तो नहीं, परन्तु खाने के काम तो आता ही है । इसी प्रकार विद्वान् की निर्वीर्य इच्छा भी उसको थोड़ा सा भोग तो दे ही सकती है। बहुत से व्यसन को उत्पन्न नहीं कर सकती। [तत्त्वज्ञानी लोग प्रारब्ध को भोगते समय मनोरथों के क़िले नहीं बनाते हैं] । भोगेन चरितार्थत्वात् प्रारब्धं कर्म हीयते । भोक्तव्यसत्यताभ्रान्त्या व्यसनं तत्र जायते ॥१६६॥ भोग देकर चरितार्थ हो चुकने के कारण, प्रारब्ध कर्म तो भोग देते ही नष्ट हो जाता है । [वह व्यसन को उत्पन्न नहीं करता] । जब तो किसी को भोक्तव्य पदार्थों के सत्य होने का भ्रम हो जाता है तब ही उस विषय में आगे को व्यसन उत्पन्न होता है [भोगते समय जो सुख दुःख मिलते हैं वे तो पूर्व कर्मों के किंवा प्रारब्ध के फल हैं। भोगते समय उन पदार्थों को सत्य १८