पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१८२ पंचदशी समझ कर उनके विषय में जो अनकें संकल्प उठते हैं, उनको अपने पास बहुत दिनों तक ठहराने की जो इच्छा होती है, उससे आगे के लिए हमारे मन में संस्कार रह जाते हैं। इन संस्कारों से प्रभावित होकर फिर फिर भोगों को जुटाने के लिए कर्म करते हैं और फिर फिर भोग आते हैं। यों शुद्ध भोग हमको भोगना नहीं आता किन्तु भोगते समय ही उन भोगों को आगे के लिए नौता दे देकर हम अज्ञानी लोग भोग और कर्म का अनन्त चक्कर घुमा रहे हैं।] मा विनश्यत्वयं भोगो वर्धतामुत्तरोत्तरम् । मा विघ्नाः प्रतिबध्नन्तु धन्योऽस्म्यस्मादिति भ्रमः ॥१६७॥ यह मुझे मिला हुआ भोग, कभी भी नष्ट न हो, यह तो उत्तरोत्तर चढ़ता ही जाय, भगवान् करे कि—कोई भी विघ्न इस भोग में रुकावट न डाल दे, मैं तो इस भोग के कारण कृतार्थ हो रहा हूँ। बस इसी तरह की निरर्थक और अनहोनी बातें 'भ्रम'कहाती हैं [ऐसे विचारों से व्यसन की उत्पत्ति हुआ करती है। लौकिक लोग प्रारब्ध फल को भोगते समय जब कि लाख मुद्रा देने वाला कर्म आता है तब बड़े प्रसन्न होते हैं परन्तु प्रारब्ध के समाप्त हो जाने पर जब वे मुद्रायें नष्ट हो जाती हैं तब वे प्रारब्ध कर्म को तो पहचानते नहीं कि यह कर्म इतना ही था और दहाड़ मार कर रोते हैं कि हाय ! मैं बर- बाद हो गया ] । यदभावि न तद्भावि भावि चेन्न तदन्यथा । इति चिन्ताविषघ्नोऽयं बोधो भ्रमनिवर्तकः ॥१६८॥ 'जो होना नहीं है, वह तो कभी होगा ही नहीं। जो होना