भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 309

[Page Header: तृप्तिदीपप्रकरणम् २८९]

'निर्विकल्प समाधि में क्योंकि द्वैत का दर्शन नहीं होता, इससे केवल उसे ही अपरोक्ष विद्या समझ बैठना ठीक नहीं। क्योंकि फिर ऐसे तो सुषुप्ति को भी 'अपरोक्ष विद्या' क्यों नहीं कहते हो [उस सुषुप्ति में भी तो द्वैत की प्रतीति नहीं होती है]। आत्मतत्त्वं न जानाति सुप्तो यदि तदा त्वया। आत्मधीरेव विद्येति वाच्यं न द्वैतविस्मृतिः ॥१८६॥ यदि यह कहा जाय कि—सुषुप्त पुरुष [द्वैत का दर्शन तो नहीं करता, परन्तु वह तो] आत्मतत्व को भी नहीं जानता। इससे उसे विद्यावान् नहीं माना जाता। तब तो फिर स्पष्ट शब्दों में आत्मज्ञान को ही विद्या कहना चाहिए, [द्वैत के विस्मरण को आत्मज्ञान कहना ठीक नहीं है]। उभयं मिलितं विद्या यदि तर्हि घटादयः । अर्धविद्याभाजिनः स्युः सकलद्वैतविस्मृतेः ॥१८७॥ यदि तो 'द्वैत का अदर्शन' और 'आत्मज्ञान' इन दोनों को मिला कर 'विद्या' कहा जाय तो यह मानना पड़ेगा कि घटादियों को आधा ज्ञान तो प्राप्त हो ही गया है। क्योंकि ये सम्पूर्ण द्वैत को तो भूले हुए ही हैं। [विद्या के दो भाग हैं एक द्वैत का अदर्शन दूसरा आत्मदर्शन ऐसा यदि मानें तो विद्या का एक भाग घटादि में भी पाया जाता है तो क्या वे भी विद्यावान् हैं ?] मशकध्वनिमुख्यानां विक्षेपाणां बहुत्वतः । तव विद्या तथा न स्याद् घटादीनां यथा दृढा ॥१८८॥ मच्छर की ध्वनि आदि बहुत से विक्षेप होने के कारण तेरी विद्या तो उतनी दृढ भी नहीं है, जितनी कि घटादि की