पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 310, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें२९० पञ्चदशी है [घटादि जैसे द्वैत को भूल गये हैं वैसे तो तुम भूल भी नहीं सकते हो] । आत्मधीरेव विद्येति यदि तर्हि सुखी भव । दुष्टचित्तं निरुन्ध्याच्चेन्निरुन्धि त्वं यथासुखम् ॥१८९॥ [यों नाकेबन्दी कर देने पर जब तुम बेबस होकर यह कह उठोगे कि] फिर ऐसे तो आत्मज्ञान ही 'विद्या' है । तो [हमारा आशीर्वाद लो और] सुखी रहो । यदि [आत्मज्ञान की रक्षा के लिए] दुष्ट चित्त को रोकना चाहो तो तुम सुभीते के अनुसार चित्त को रोका करो । तदिष्ट मेष्टव्यमायामयत्वस्य समीक्षणात् । इच्छन्नप्यज्ञवन्नेच्छेत् किमिच्छन्निति हि श्रुतम् ॥१९०॥ उस दुष्ट चित्त को रोकना तो हमें भी इष्ट ही है । क्योंकि [चित्त के दोषों के नष्ट हो जाने पर ही अद्वितीय आत्मा का ज्ञान होने के लिए] आवश्यक जो जगत् की मायामयता है उसका भले प्रकार ईक्षण तभी (दुष्ट चित्त के रुकने पर ही) किया जा सकता है [इसीलिए चित्तनिरोध हमें इष्ट है] सो भाई ! यह ज्ञानी चाहता तो है परन्तु अब यह अज्ञानी की तरह नहीं चाहता है । अब यह भोगों की खुशामद नहीं करता है, भोग मिलो या मत मिलो इसे इसकी परवा नहीं होती । इसी सब अभिप्राय को लेकर हमारी व्याख्येय श्रुति में 'किमिच्छन्' यह शब्द कहा गया है । रागो लिङ्गमबोधस्य, सन्तु रागादयो बुधे । इति शास्त्रद्वयं सार्थमेवं सत्याविरोधतः ॥१९१॥ 'रागो लिंगमबोधस्य चित्तव्यायामभूमिषु । कुतः शांदूलता तस्य