पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृप्तिदीपप्रकरणम् २९१ यस्याग्निः कोटरे तरोः' यह शास्त्र तो कहता है कि 'राग अज्ञान की निशानी है' अर्थात् तत्वज्ञानी में राग नहीं होना चाहिये । 'शास्त्रार्थस्य समाप्तत्वान्मुक्तिः स्यात्तावता मितेः। रागादयः सन्तु कामं न तद्भावोऽपराध्यते' यह दूसरा शास्त्र कहता है कि 'ज्ञानी में रागादि हैं तो हुआ करें । उनके होने से ज्ञानी के ज्ञान को आँच नहीं लगती । तत्वज्ञानी का राग दृढ राग नहीं होता है' ऐसा मान लेने पर ही अंविरोध होजाने के कारण ये दोनों शास्त्र सार्थक हो जाते हैं । इन दोनों शास्त्रों की संगति लग जाती है । जो शास्त्र ज्ञानी में राग का निषेध करता है उसका अभि- प्राय यही है कि—ज्ञानी में दृढराग नहीं होता । जो शास्त्र यह कहता है कि—ज्ञानी में राग हुआ करो उसका कुछ बिगड़ता नहीं । उसका अभिप्राय यही है कि ज्ञानी में दिखावटी राग हुआ करो उसका होना कुछ बुराई नहीं है । जगन्मिथ्यात्ववत् स्वात्मासङ्गत्वस्य समीक्षणात् । कस्य कामायेति वचो भोक्त्रभावविवक्षया ॥१९२॥ जगत् को मिथ्या समझ लेने के कारण सच्चा काम्य पदार्थ कोई भी नहीं है, यह बात जैसे 'किमिच्छन्' इस पद से कही गयी है, इसी प्रकार जब आत्मा को असंग रूप में पहचान लिया जाता है, तब तो वास्तव भोक्ता भी कोई नहीं रह जाता। इसी भाव को श्रुति ने 'कस्य कामाय' किसके लिये इस वाक्य से व्यक्त किया है । पतिजायादिकं सर्वं तत्तद्भोगाय नेच्छति । किन्त्वात्मभोगार्थमिति श्रुतावुद्घोषितं बहु ॥१९३॥ यह प्राणी पति, पत्नी आदि जिस किसी को भी चाहता है,