पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 312, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१९२ पञ्चदशी उसे उसके भोग के लिये नहीं चाहता। उसे तो वह केवल अपने भोग के लिए ही चाहता है। यह बात श्रुति में बड़े ज़ोरों से कही गयी है । किं कूटस्थश्चिदाभासोऽथवा किं वोभयात्मकः । भोक्ता, तत्र न कूटस्थोऽसङ्गत्वाद् भोक्तृतां व्रजेत् ॥१९४॥ यदि कोई आत्मा को भोक्ता समझता हो तो वह यह बताये कि—कूटस्थ, चिदाभास, या ये दोनों मिले हुए, इन तीनों में से भोक्ता कौनसा है ? असङ्ग होने के कारण कूटस्थ तो भोक्ता नहीं हो सकता । सुखदुःखाभिमानारख्यो विकारो 'भोग' उच्यते । कूटस्थश्च विकारी चेत्येतन्न व्याहतं कथम् ॥१९५॥ सुख दुःख में अभिमान करना—अपने आपको सुखी या दुःखी मानने लगना,सुख दुःख आ पड़ने पर विकारी हो जाना, बस यह विकार ही तो 'भोग' कहाता है। तब बताओ कि— कूटस्थ भी हो और विकारी भी हो, यह बात व्याहत क्यों नहीं है ? [कूटस्थता और विकारिता एक जगह रह ही नहीं सकती है ।] विकारिबुद्ध्यधीनत्वा दाभासे विकृतावपि । निराधिष्ठानविभ्रान्तिः केवला नहि तिष्ठति ॥१९६॥ चिदाभास तो विकारशील बुद्धि के अधीन हुआ करता है, इस कारण उस आभास के अपने स्वरूप में विकार होना सम्भव है,परन्तु भ्रान्ति का स्वभाव है कि.वह बिना अधिष्ठान के केवल तो रहती ही नहीं---