पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 320, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३०० पञ्चदशी [जब कि उसको असंग जान लिया जाता है तब] विकारी होने के कारण विज्ञानमय कहानेवाला जो चिदाभास है वह ही भोक्ता रह जाता है । मायिकोयं चिदाभासः श्रुतेरनुभवादपि । इन्द्रजालं जगत् प्रोक्तं तदन्तःपात्ययं यतः ॥२१७॥ श्रुति और अनुभव इन दोनों का कहना मानें तो यह चिदा- भास तो मायिक [किंवा मिथ्या] है । विद्वान् लोग तो इस सभी जगत् को इन्द्रजाल की तरह मिथ्या मानते हैं । वे कहते हैं कि—क्योंकि यह चिदाभास भी उस जगत् के अन्तर्भूत ही है, इस कारण यह भी मिथ्या ही है । बिलयोप्यस्य सुप्त्यादौ साक्षिणा ह्यनुभूयते । एतादृशं स्वस्वभावं विविनक्ति पुनः पुनः ॥२१८॥ सुषुप्ति या मूर्छा जब आजाती है, तब यह साक्षी [आत्मा] इस चिदाभास के विलय किंवा नाश को अनुभव किया करता है । यों कूटस्थ से अलगाये हुए चिदाभास को मायिक समझ लेने पर यह होता है कि यह चिदाभास अपने ऐसे मिथ्या स्वभाव का स्वयं ही बार बार विवेक करने लगता है । [यह अपनी कमी को—अपने नश्वरपने को पहचान कर अपने मन में इस बात को अनन्त बार दोहराता है, उसको इस जगद्व्यवहार को देख कर हँसी और आश्चर्य दोनों होते हैं] । विविच्य नाशं निश्चित्य पुनर्भोगं न वाञ्छति । मुमूर्षुः शायितो भूमौ विवाहं कोऽभिवाञ्छति ॥२१९॥ विवेक करते करते, अपने नाश का निश्चय जब कर लेता है, तब वह भोगों की इच्छा करना ही छोड़ बैठता है । क्या