पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 321, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंभला जिस मुमूर्षु को खाट से भूमि पर उतार लिया गया हो वह कभी भी अपना विवाह कराना चाहेगा ? जिहेति व्यवहर्तुं च भोक्ताहमिति पूर्ववत् । छिन्ननास इव हीतः क्लिश्यन्नारब्धमश्नुते ॥२२०॥ उसकी कुछ ऐसी विचित्र अवस्था हो जाती है कि-यह तो अब पहले की तरह, अपने को भोक्ता कहता हुआ भी शरमाता है। 'अभी तक मेरे प्रारब्ध कर्म समाप्त नहीं हुए' इस दुःख को लिये हुए ही, नाक कटे आदमी के समान लज्जित रह कर अपने प्रारब्ध को भोगा करता है। यदा स्वस्यापि भोक्तृत्वं मन्तुं जिह्वेत्ययं तदा । साक्षिण्यारोपयेदेतदिति कैव कथा वृथा ॥२२१॥ यह चिदाभास जब अपने आपको भी भोक्ता मानता हुआ शरमाने लगता है तब यह बिचारा अपने भोक्तापने के दोष को साक्षी पर लादेगा, ऐसी वृथा शंका तो करनी ही नहीं चाहिए। इत्यभिप्रेत्य भोक्तार माक्षिपत्यविशङ्कया । कस्य कामायेति ततः शरीरानुज्वरो न हि ॥२२२॥ [कूटस्थ या चिदाभास कोई भी पारमार्थिक भोक्ता नहीं है] इसी अभिप्राय को लेकर 'कस्य कामाय' इस श्रुति ने निःशंक होकर भोक्ता का निषेध कर दिया है। ऐसा हो जाने पर फिर उसे इस शरीर के साथ कभी भी सन्तप्त होना नहीं पड़ता । [ऐसा ज्ञानी जब ज्वर से पीड़ित होता है तब उसका विश्लेषण यों करना चाहिए कि-उसके शरीर को ज्वर आता है, वह तटस्थ होकर उस ज्वरित शरीर को देखा करता है। उस दुःखी शरीर के साथ वह दुःखी कभी नहीं होता । कैसा भी कष्ट आ पड़ने