भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 322, कुल 726 में से

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३०२ पञ्चदशी पर वह अपनी तटस्थता को टूटने नहीं देता । यह तटस्थता ही ज्ञानियों का गुप्त धन माना जाता है ] । स्थूलं सूक्ष्मं कारणं च शरीरं त्रिविधं स्मृतम् । अवशं त्रिविधोऽस्त्येव तत्र तत्रोचितो ज्वरः ॥२२३॥ स्थूल सूक्ष्म और कारण तीन प्रकार का शरीर होता है। उन उन शरीरों में तीनों तरह का संताप भी हुआ ही करता है। [उसमें किसी का बस नहीं है कि उस सन्ताप को हटा सके।] वातपित्तश्लेष्मजन्यव्याधयः कोटिशस्तनौ । दुर्गन्धित्वकुरूपत्वदाहभङ्गादयस्तथा ॥२२४॥ इस स्थूल शरीर में वात, पित्त, कफ से उत्पन्न होने वाली, अनन्त बीमारियां, दुर्गन्धि किंवा कुरूप होना, जल जाना, या चोट लग जाना, आदि अनेक ज्वर [उपद्रव] रहते ही हैं। कामक्रोधादयः शान्तिदान्त्याद्या लिङ्गदेहगाः ज्वरा, द्वयेऽपि बाधन्ते प्राप्त्याप्राप्त्या नरं क्रमात्॥२२५॥ काम क्रोधादि तथा शान्ति दान्ति आदि लिङ्ग शरीर के ज्वर हैं। जब काम क्रोधादि आते हैं तब वे सूक्ष्म शरीर को दुःखी करते हैं तथा जब शान्ति आदि नहीं आते तब भी लिङ्ग देह दुःखी होता है। यों ये दोनों, क्रम से पाने और न पाने से दुःखी किया करते हैं। स्वं परं च न वेत्त्यात्मा विनष्ट इव कारणे । आगामिदुःखबीजं चेत्येतदिन्द्रेण दर्शितम् ॥२२६॥ ‘नहि खल्वयमेवं संप्रत्यात्मानं जानात्ययमहमस्मीति, नो एवेमानि भूतानि,विनाशमेवापीतो भवति नाहमत्रभोग्यं पश्यामि’ (छा० ८-११-२) इस श्रुति में इन्द्र ने अपने प्रजापति गुरु से यह कहा है कि—

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