भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 323, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 323

[Page Header] तृप्तिदीपप्रकरणम् ३०३


वह न तो अपने आपको ही जानता है और न दूसरे को ही पहचान पाता है। कारण शरीर में पहुँच जाने पर तो यह [अज्ञान के कारण] विनष्ट सा ही हो जाता है, यही अवस्था अगले दिनों में आने वाले दुःखों का कारण भी होती है। एते ज्वराः शरीरेषु त्रिषु स्वाभाविका मताः । वियोगे तु ज्वरैस्तानि शरीराण्येव नासते ॥२२७॥ तीनों शरीरों में प्रतीत होने वाले ये ज्वर शरीरों के साथ ही साथ लगे हुए हैं। ये तो उनमें स्वभाव से ही रहते हैं। इन्हें कोई उनमें से हटा नहीं सकता। स्थूल शरीर रोगी न हों, काम क्रोधादि मन में उत्पन्न न हों, अज्ञान में दुःख रूपी भेड़िये छिपे न बैठे हों, यह कभी होना ही नहीं है। क्योंकि इन ज्वरों का जब इन शरीरों से वियोग हो जाता है तब तो फिर ये शरीर ही नहीं रहने पाते [इसी से कहते हैं कि ये तो स्वाभाविक हैं] तन्तौर्वियुज्येत पटो वालेभ्यः कम्बलो यथा । मृदो घटस्तथा देहो ज्वरेभ्योऽपीति दृश्यताम् ॥२२८॥ तन्तु से यदि वस्त्र वियुक्त हो सकता हो, बालों से यदि कम्बल को पृथक् किया जा सकता हो, मिट्टी से यदि घट को अलग करना सम्भव हो तो यह भी हो सकता है कि ज्वरों से देह को बचाया जा सके [ये शरीर तो विपत्ति के वृक्ष हैं] । चिदाभासे स्वतः कोऽपि ज्वरो नास्ति, यतश्चितः । प्रकाशैकस्वभावत्वमेव दृष्टं न चेतरत् ॥२२९॥ चिदाभास को स्वयं तो कोई भी ज्वर नहीं होता [उसको तो शरीरों के सम्बन्ध के कारण ही ज्वर होते हैं]। विद्वान् साधक जब समाधिभावना में बैठ कर देखते हैं, तब वे चित्

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित) · पृष्ठ 323, कुल 726 में से · BharatKosha