पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंहुए पलायन पर भी पछताना पड़ता है [ कि मैं मूर्ख वृथा ही दौड़ पड़ा था । ] मिथ्याभियोगदोषस्य प्रायश्चित्तप्रसिद्धये । क्षमापयन्निवात्मानं साक्षिणं शरणं गतः ॥२३६॥ [ लोक में जब कोई किसी पर झूठा दोष लगा देता है तब वह उसका यह प्रायश्चित्त करता है कि जिस पर उसने दोष लगाया था, उससे बार बार क्षमा मांगता है। इसी प्रकार] उस चिदाभास ने जो कि साक्षी असङ्ग आत्मा में, भोक्ता आदि धर्मों का आरोप कर रक्खा था [उस असङ्ग आत्मा को वृथा ही कर्ता भोक्ता आदि मान लिया था ] उस पाप का प्रायश्चित्त करने के लिये मानों [ अनादि काल के ] अपने अपराध को क्षमा करवाने के लिये साक्षी आत्मा की शरण में जापड़ा [अर्थात् कहने लगा कि-मैं तो सच्चिदानन्द रूप ही हूँ। मैं तो अब तक इस आत्मतत्व को वृथा ही कर्ता भोक्ता आदि मान रहा था। हे आत्मदेव ! अब मैं ऐसा आत्मद्रोह कभी न करूँगा इत्यादि । ] आवृत्तपापनुत्यर्थं स्नानाद्यावर्त्यते यथा । आवर्तयन्निव ध्यानं सदा साक्षिपरायणः ॥२३७॥ जैसे पापी पुरुष, अपने अभ्यस्त पाप को हटाने के लिये, स्नान आदि प्रायश्चित्त को बार-बार किया करता है, इसी प्रकार इस चिदाभास ने जो साक्षी में चिरकाल तक संसारित्व आदि धर्मों का आरोप कर लिया था, उस दोष को हटाने के लिये ही, ध्यान की आवृत्ति करते हुए पुरुषों की तरह, सदा ही साक्षिपरायण रहने लगता है ।