पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 327, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंतृप्तिदीपप्रकरणम् ३०७ उपस्थकुष्ठिनी वेश्या विलासेषु विलज्जते । जानतोऽग्रे तथाऽऽभासः स्वप्रख्यातौ विलज्जते ॥२३८॥ जिस वेश्या को सुजाक जैसा अधम रोग हो गया हो, वह जैसे विलास में लज्जा किया करती है, उसी की तरह यह चिदा- भास भी ज्ञानी के सामने अपने गुणों को कहता हुआ भी शरमाने लगता है। [ अपने आपको 'मैं' कहते हुए उसे लज्जा आती है ] गृहीतो ब्राह्मणो म्लेच्छैः प्रायश्चित्तं चरन् पुनः । म्लेच्छैः संकीर्यते नैव, तथाभासः शरीरकैः ॥२३९॥ जिस ब्राह्मण को म्लेच्छों ने पकड़ लिया हो [ जो म्लेच्छों के साथ खाने पीने लगा हो] वह जब प्रायश्चित्त कर लेता है,तब फिर म्लेच्छों में रिला मिला नहीं रहता [उनसे अलग हो जाता है ।] इसी प्रकार यह चिदाभास उक्त प्रकार का प्रायश्चित करके फिर शरीरों के साथ संकरता को प्राप्त नहीं होता है। यौवराज्ये स्थितो राजपुत्रः साम्राज्यवाञ्छया । राजानुकारी भवति तथा साक्ष्यनुकार्ययम् ॥२४०॥ जो राजपुत्र युवराज बन चुका हो, वह साम्राज्य पाने की इच्छा से राजा का अनुकरण किया करता है [ वह उसी की तरह प्रजारंजन आदि करने लगता है] इसी प्रकार यह चिदा- भास भी आत्मसाम्राज्य को पाने की इच्छा से, सदा साक्षी का ही अनुकरण करने लगता है । यो ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवत्येव इति श्रुतिम् । श्रुत्वा,तदेकचित्तः सन्, ब्रह्म वेत्ति, न चेतरत् ॥२४१॥ इस श्रुति को सुनकर जब कोई पूर्णरूप से तन्निष्ठ