पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 328, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें१०८ पञ्चदशी होजाता है, तब वह ब्रह्म को जान जाता है। उस समय ब्रह्म के अतिरिक्त किसी भी पदार्थ का ज्ञान उसे नहीं रहता। [स यो ह वै तत्परमं ब्रह्मवेद ब्रह्मैव भवति (मु० ३-२-९) इस श्रुति को सुनकर यह निश्चय होता है कि साक्षी का अनुसरण करना वृथा नहीं जाता]। देवत्वकामा ह्यग्न्यादौ प्रविशन्ति यथा तथा । साक्षित्वेनावशेषाय स्वविनाशं स वाञ्छति ॥२४२॥ [ब्रह्मज्ञान हो जाने से जब ब्रह्मभाव की प्राप्ति होती है तब चिदाभासपना नष्ट हो जाता है। इस पर प्रश्न यह होता है कि वह चिदाभास अपने नाश के लिये प्रयत्न क्यों करता है ? इसी का उत्तर—इस श्लोक में दिया है]—जो मनुष्य देव बनना चाहते हैं, वे जलती अग्नि में या गंगा आदि में प्रवेश कर जाते हैं [और अपना शरीरपात कर देते हैं] इसी प्रकार साक्षीरूप से शेष रह जाने के लिये वह चिदाभास अपना विनाश भी चाह लेता है। [जैसे देवभावरूपी ऊँची श्रेणी को पाने की इच्छा से, उससे अधम मनुष्यशरीर को त्याग दिया जाता है, इसी प्रकार साक्षीरूप को पा जाने के उत्तम फल को देखकर, यह चिदाभास अपने अधम चिदाभासपन को त्याग कर ब्रह्मज्ञान में प्रवृत्त हो जाता है। भले ही उससे उसका चिदाभासपना ही जाता रहता हो।] यावत् स्वदेहदाहं स नरत्वं नैव मुञ्चति । यावदारब्धदेहं स्यान्नाभासत्वविमोचनम् ॥२४३॥ अग्नि में घुसे हुए उस पुरुष का देह जब तक भस्म नहीं हो चुकता, तब तक वह अपने मनुष्यत्व से मुक्त नहीं हो पाता