पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंतृप्तिदीपप्रकरणम् ३१९ मुझे तो अब यह निश्चय हो गया है कि मुझे जो कुछ करना था सो मैं कर चुका हूँ तथा जो कुछ मुझे पाना था सो मैं पा चुका हूँ। व्यवहारो लौकिको वा शास्त्रीयो चान्यथापि वा । ममाकर्तुरलेपस्य यथारब्धं प्रवर्तताम् ॥२६७॥ कर्ता और भोक्तापन जिस मुझ में नहीं है, उस मेरा जो भी भिक्षा आदि लौकिक, जप समाधि आदि शास्त्रीय तथा हिंसा आदि प्रतिषिद्ध व्यवहार है, वह सबका सब जैसा मेरा प्रारब्ध हो उसके अनुकूल चलता रहो। [मुझे अब उसकी विशेष परवा नहीं है] अथवा कृतकृत्योऽपि लोकानुग्रहकाम्यया । शास्त्रीयेणैव मार्गेण वर्तेहं का मम क्षतिः ॥२६८॥ अथवा यों समझो कि मैं तो कृतकृत्य हो ही चुका हूँ। परन्तु लोकानुग्रह [प्राणियों पर कृपा] की इच्छा से मैं शास्त्र के अनुकूल मार्ग से ही चलता हूँ। मेरी तो उससे भी कुछ हानि नहीं होनी है। [मोक्ष तक पहुँचने का जो सरल राज- मार्ग है, वह दूसरों को भी दिखा दिया जाय, ज्ञानी लोगों की लापरवाही से वह मोक्ष की पद्धति नष्ट न हो जाय, इस कारण लोकसंग्रह के लिये भी ज्ञानी को शुभकर्म करने ही चाहियें। बिल्ली जैसे अपने बच्चों को चूहे का शिकार करना सिखा जाती है, उसी प्रकार अविद्या का शिकार करना प्रत्येक साधक को, ज्ञानी लोग सिखा दें तो वह मार्ग अक्षुण्ण बना रह सकता है]