पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 340, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३२० पञ्चदशी देवार्चनस्नानशौचभिक्षादौ वर्ततां वपुः । तारं जपतु वाक्तद्वत् पठत्वाम्नायमस्तकम् ॥२६९॥ विष्णुं ध्यायतु धीर्यद्वा ब्रह्मानन्दे विलीयताम् । साक्ष्यहं किंचिदप्यत्र न कुर्वे नापि कारये ॥२७०॥ यह मेरा शरीर देवार्चन करे, स्नान कर, शौच या भिक्षा- चरण करे, यह मेरी वाणी तार (प्रणव) का जप करे, या वेदान्त शास्त्र का पाठ करती रहे, यह मेरी बुद्धि चाहे तो विष्णु का ध्यान करे या ब्रह्मानन्द में विलीन हो जाय । इन सब कामों में से मैं तो कुछ भी करता या करवाता नहीं हूँ । मैं तो इन सब का साक्षी हूँ । एवं च कलहः कुत्र संभवेत् कर्मिणो मम । विभिन्नविषयत्वेन पूर्वापरसमुद्रवत् ॥२७१॥ ऐसी परिस्थिति में पूर्व और पश्चिम समुद्र के समान, भिन्न विषय होने से, कर्मी के साथ मेरा झगड़ा कहां रहा । [कर्मी और मैं दोनों एक ही विषय पर कथन करते, तो उस का हमारा कलह होना संभव भी था] वपुर्वाग्धीषु निर्बन्धः कर्मिणो नतु साक्षिणि । ज्ञानिनः साक्ष्यलेपत्वे निर्बन्धो नेतरत्र हि ॥२७२॥ कर्मों का निर्बन्ध तो शरीर वाणी और बुद्धि तक ही है । साक्षी में उसका कुछ भी निर्बन्ध नहीं है [उससे उसको कुछ भी मतलब नहीं है] इसके विपरीत ज्ञानी का निर्बन्ध तो साक्षी के निर्लेपपने में है । उन शरीरादियों में उसका निर्बन्ध कुछ भी नहीं है [देह से उसका कोई भी नाता नहीं रहता है।]