पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंकूटस्थदीपप्रकरणम् ३३१ दीप्तियों के बीच बीच में दूसरी जो सामान्यप्रभा रूपी सूर्य- दीप्ति है वह भी देखी ही जाती है। दर्पणों की अनेक प्रभायें जब नहीं रहतीं वह [सामान्य प्रभा] तो तब भी सब जगह प्रकाशित ही रहती है। चिदाभासविशिष्टानां तथानेकधियामसौ । सन्धिं धियामभावं च भासयन् प्रविविच्यताम् ॥३॥ ऊपर कहे हुए दृष्टान्त के अनुसार, चिदाभासयुक्त जो अनेक बुद्धियां किंवा अनेक बुद्धिवृत्तियां होती हैं, [जाग्रत् तथा स्वप्न में तो] उन बुद्धियों के सन्धिकाल को प्रकाशित करने वाले तथा [सुषुप्ति के समय] उन बुद्धियों के अभाव को प्रकाशित करने वाले, इस कूटस्थ को [ऊपर कहे दृष्टान्त के अनुसार उन बुद्धियों से] पृथक् जान लो। जाग्रत् तथा स्वप्न के समय एक वृत्ति नष्ट होती है; दूसरी उत्पन्न होती है। इन दोनों वृत्तियों की सन्धि को जब कि थोड़े से समय के लिये कोई भी वृत्ति नहीं रहती—जो कोई तत्व प्रकाशित करता है, वही कूटस्थ चैतन्य है। सुषुप्ति के समय जब कोई भी बुद्धिवृत्ति नहीं रहती, तब वृत्तियों के अभाव को जो कोई तत्त्व प्रकाशित करता है, वही कूटस्थ चैतन्य है। वह इन बुद्धिवृत्तियों से और इनके अभावों से सर्वथा भिन्न है। यों उस कूटस्थ तत्व का विवेक कर लेना चाहिये। घटैकाकारधीस्था चिद्घटमेवावभासयेत् । घटस्य ज्ञातता ब्रह्मचैतन्येनावभासते ॥४॥ घट को देखते समय जो बुद्धि केवल घटाकार हो जाती है, उस बुद्धि में जिस चैतन्य का आभास पड़ता है, वह तो