पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 352, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३३२ पञ्चदशी केवल घट को ही प्रकाशित किया करता है । परन्तु उस घट में जो ज्ञातता नाम का धर्म रहता है [जिस धर्म के सहारे से ‘घट को जान लिया’ यह व्यवहार किया जाता है] उसको तो [घट की कल्पना का अधिष्ठान] ब्रह्मचैतन्य ही प्रकाशित किया करता है [यों देह से बाहर चिदाभास और ब्रह्म को पृथक् पृथक् समझ लेना चाहिये ] अज्ञातत्वेन ज्ञातोयं घटो बुद्धयुदयात् पुरा । ब्रह्मणैवोपरिष्टात्तु ज्ञातत्वेनेत्यसौ भिदा ॥५॥ जब तक बुद्धि उत्पन्न नहीं हो जाती, तब तक तो यह घट अज्ञात रूप से ब्रह्मतत्त्व से ही ज्ञात रहता है । बुद्धि की उत्पत्ति हो जाने पर तो वही ब्रह्म इसे ज्ञातरूप से प्रकाशित करने लग पड़ता है, बस केवल इतना सा ही भेद है [ऐसी अवस्था में यह शंका निर्मूल हो जाती है कि—ज्ञातता को भासित करने वाले चैतन्य से ही घट की प्रतीति भी हो सकती है। बुद्धि की क्या आवश्यकता होती है ? क्योंकि ज्ञातता आदि भेदों की सिद्धि के लिये बुद्धि की भी परमावश्यकता तो रहती ही है ।] चिदाभासान्तधीवृत्तिर्ज्ञानं लोहान्तकुन्तवत् । जाड्यमज्ञानमेताभ्यां व्याप्तः कुम्भो द्विधोच्यते ॥६॥ [‘ज्ञातता’ और ‘अज्ञातता’ कराने वाले ‘ज्ञान’ और ‘अज्ञान’ का स्वरूप इस श्लोक में बताया गया है] भाले की नोक पर जैसे लोहा लगा रहता है, इसी प्रकार चित्प्रतिबिम्ब से युक्त जो बुद्धि वृत्ति है [ जिस बुद्धिवृत्ति के अन्त अर्थात् अग्रभाग में चिदाभास लगा रहता है ] उस को तो ‘ज्ञान’ कहते हैं। जो तो जाड्य है—[जो स्वतः स्फूर्ति का न होना है]