पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१८ पञ्चदशी अद्वयानन्द आत्मतत्व को ढक दिया है और आत्मा को क्लेश पहुँचा रक्खा है इसी से इनको भी 'कोश' कहा जाता है। स्यात् पंचीकृतभूतोत्थो देहः स्थूलोऽन्नसंज्ञकः । लिङ्गे तु राजसैः प्राणैः प्राणः कर्मेन्द्रियैः सह ॥ ३४ ॥ पंचीकृत भूतों से उत्पन्न हुआ यह स्थूल देह 'अन्नमय कोश' कहाता है। लिङ्ग शरीर में के राजस [रजोगुण से बने हुए] पांच प्राणों से तथा वागादि कर्मेन्द्रियों से मिलकर 'प्राणमय कोश' हो जाता है। सात्विकैर्धीन्द्रियैः साकं विमर्शात्मा मनोमयः । तैरेव साकं विज्ञानमयो धीर्निश्चयात्मिका ॥३५॥ विमर्शात्मा मन तथा सात्विक ज्ञानेन्द्रियां मिलकर 'मनोमय कोश' कहाते हैं। उन्हीं ज्ञानेन्द्रियों के साथ मिली हुई निश्चया- त्मिका बुद्धि 'विज्ञानमय कोश' कही जाती है। कारणे सत्त्वमानन्दमयो मोदादिवृत्तिभिः । तत्तत्कोशैस्तु तादात्म्यादात्मा तत्तन्मयो भवेत् ॥३६॥ कारण शरीर में मोदादि वृत्तियों के साथ रहनेवाले [मलिन] सत्व को 'आनन्दमय कोश' कहते हैं। यह हमारा आत्मा उन उन कोशों के साथ तादात्म्य कर लेने पर तत्तन्मय [उन उन के रूप का] सा हो जाता है। कारण शरीर कहानेवाली अविद्या में जो कि मलिन सत्व रहता है, वह जब उन उन प्रिय मोद तथा प्रमोद नाम की वृत्तियों से युक्त हो जाता है [जो कि वृत्तियें क्रम से इष्ट पदार्थ के मिलने की आशा से, इष्ट पदार्थ के मिलने से तथा इष्ट पदार्थ के भोगने से, पैदा हुआ करती हैं] तब 'आनन्दमयकोश'कहाने लगता है।