भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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तत्त्वविवेकप्रकरणम् १९ वह आत्मा उस उस कोश के साथ जब तादात्म्याभिमान कर लेता है तब उस उस कोशमय सा हो जाता है । परन्तु असल में तो वह उन उन कोशों से अत्यन्त विलक्षण ही रहता है । अन्वयव्यतिरेकाभ्यां पञ्चकोशविवेकतः । स्वात्मानं तत उद्धृत्य परं ब्रह्म प्रपद्यते ॥३७॥ अन्वयव्यतिरेक नाम की युक्ति से, या तो पांच कोशों को आत्मा से पृथक् पहचान कर या आत्मा को उन पांच कोशों में से पृथक् पहचान कर अपने आत्मा को उनमें से बाहर करके, परब्रह्म ही हो जाता है । आगे बतायी हुई अन्वय-व्यतिरेक नामकी युक्तियों से पांचों कोशों का विवेक कर लेने पर [ उनको आत्मा से पृथक् कर लेने पर ] अथवा आत्मा को ही उनमें से पृथक् कर लेने पर, बुद्धि की सहायता से अपने आत्मा को उन कोशों में से बाहर निकालकर, अपने चिदानन्द स्वरूप का निश्चय करके अधिकारी पुरुष परब्रह्म को प्राप्त हो जाता है, किंवा स्वयं परब्रह्म ही हो जाता है । अभाने स्थूलदेहस्य स्वप्ने यद् भानमात्मनः । सोऽन्वयो व्यतिरेक स्तद्भानेऽन्यानवभासनम् ॥३८॥ स्वप्नावस्था में जब इस स्थूलदेह का तो भान नहीं रहता,किंतु आत्मा का भान बना रहता है [उस समय स्वप्न के साक्षी के रूप में जो आत्मा का स्फुरण होता है ] यह तो आत्मा का 'अन्वय' [ अर्थात् अनुवृत्त होना ] कहाता है । तथा उसी स्वप्नावस्था में उस आत्मा की स्फूर्ति होने पर, जब इस स्थूलदेह का भान नहीं रह जाता है तब यही स्थूलदेह का 'व्यतिरेक'