पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 360, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३४० पञ्चदशी ५-९) यह शास्त्र चिदाभास का प्रतिपादन करता है इन में से एक [चिदाभास] विकारी है दूसरा [कूटस्थ] अविकारी है। यह तो २४वें श्लोक में युक्ति देकर बता चुके हैं। बुद्धयवच्छिन्नकूटस्थो लोकान्तरगमागमौ । कर्तुं शक्तो घटाकाश इवाभासेन किं वद ॥२७॥ जैसे कि घट के द्वारा घटाकाश गमनागमन कर लेता है, इसी प्रकार बुद्धि से अवच्छिन्न जो कूटस्थ है वही बुद्धि के द्वारा लोकान्तर का गमनागमन कर लेगा। फिर यह बताओ कि तुम इस चिदाभास को क्यों मानते हो ? [ चिदाभास की कल्पना में तो गौरव होता है । ] शृण्वसङ्गः परिच्छेदमात्राज्जीवो भवेन्नहि । अन्यथा घटकुड्याद्यै रवच्छिन्नस्य जीवता ॥२८॥ इसका उत्तर भी सुनो, कि केवल परिच्छेद हो जाने से ही वह असङ्ग तत्व जीव नहीं हो जाता है। यों यदि केवल परिच्छेद होने से ही वह 'जीव' हो जाता होता तब तो घट और भित्ति आदि से परिच्छिन्न हो जाने पर भी वह जीव हो गया होता । [जो तुम्हें भी इष्ट नहीं है ।] न कुड्यसदृशी बुद्धिः स्वच्छत्वादिति चेत्तथा । अस्तु नाम परिच्छेदे किं स्वाच्छ्येन भवेत्तव ॥२९॥ यदि यह कहो कि स्वच्छ होने के कारण बुद्धि तो भित्ति के समान नहीं है, इस कारण बुद्धि परिच्छेद कर सकती है, भित्ति नहीं कर सकती। सो यह भी कथन निःसार ही है। क्योंकि बुद्धि स्वच्छ है तो हुआ करे। परिच्छेद में तो स्वच्छता का कुछ भी उपयोग नहीं है।