भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४१ प्रस्थेन दारुजन्येन कांस्यजन्येन वा न हि । विक्रेतुस्तण्डुलादीनां परिमाणं विशिष्यते ॥३०॥ लोक में भी देख लो कि जो प्रस्थ नाम का तोलने का पैमाना लकड़ी का बना है या जो कांसे का बनाया गया है उन में से लकड़ी का पैमाना अस्वच्छ है कांसे का स्वच्छ है । इन दोनों की स्वच्छता और अस्वच्छता से बेचने वाले के चावलों के परिमाण में विशेषता या न्यूनाधिकभाव नहीं आ जाता है । परिमाणाविशेषेऽपि प्रतिबिम्बो विशिष्यते । कांस्ये यदि,तदा बुद्धावप्याभासो भवेद् बलात् ॥३१॥ कांसे के बने प्रस्थ से नापने पर यद्यपि चावलों के परि- माण में अधिकता नहीं आती, परन्तु उसमें चावलों का प्रति- बिम्ब तो पड़ता ही है। यही उस में लकड़ी के प्रस्थ से अधिकता है । ऐसा यदि कहा जायगा तो हम कहेंगे कि तब तो तुम्हें ज़बरदस्ती ही बुद्धि में भी आभास पड़ने की बात मान लेनी पड़ेगी । ईषद्भासनमाभासः प्रतिबिम्बस्तथाविधः । बिम्बलक्षणहीनः सन् बिम्बवद् भासते हि सः॥३२॥ थोड़े भास को 'आभास' कहते हैं, वैसा ही प्रतिबिम्ब भी होता है । उस प्रतिबिम्ब में बिम्ब का कोई भी लक्षण [निश्चय हीं] नहीं होता । तब भी वह बिम्ब की तरह भासा करता है । [यों 'आभास' और 'प्रतिबिम्ब' एक ही बात हो जाती है ।] ससङ्गत्वविकाराभ्यां बिम्बलक्षणहीनता । स्फूर्तिरूपत्वमेतस्य बिम्बवद् भासनं विदुः ॥३३॥