पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 362, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३४२ पञ्चदशी यह चिदाभास ससङ्ग भी है और विकार युक्त भी है, इस कारण इसमें बिम्ब के [असंगता और अविकारिता रूपी] लक्षण तो नहीं रहते, परन्तु तो भी वह चिदाभास स्फूर्तिरूप है, यही इसका बिम्ब की तरह भासना कहाता है । [हेतु के लक्षणों से रहित हो और हेतु की तरह भासता हो जैसे उसे हेत्वाभास कहते हैं, ऐसे ही बिम्ब के लक्षणों से रहित हो और बिम्ब की तरह भासता हो, उसे 'आभास' कहा जाता है।] नहि धीभावभावित्वादाभासोऽस्ति धियः पृथक् । इति चेदल्पमेवोक्तं धीरप्येवं स्वदेहतः ॥३४॥ जैसे मिट्टी के होने पर ही उत्पन्न होने वाला घट, मिट्टी से भिन्न नहीं होता, इसी प्रकार बुद्धि के होने पर ही होने वाला चिदाभास, बुद्धि से पृथक् नहीं होता, ऐसा यदि कहो तो हम कहेंगे कि यह तो तुमने बहुत ही थोड़ा कहा है इस तरह तो देह से भिन्न बुद्धि भी सिद्ध नहीं हो सकेगी [क्योंकि देह के होने पर ही बुद्धि रहती है देह के न रहने पर नहीं रहती] देहे मृतेऽपि बुद्धिश्चेच्छास्त्रादस्ति तथासति । बुद्धे रन्यश्चिदाभासः प्रवेशश्रुतिषु श्रुतः ॥३५॥ यदि कहो कि—देह के मर जाने पर भी 'सविज्ञानो भवति' इस शास्त्र के प्रमाण से बुद्धि तो रहती ही है। तो हम कहेंगे कि जो तुम श्रुति के बल से देह से भिन्न बुद्धि को मानते हो, वह तुम प्रवेश श्रुतियों के बल से बुद्धि से भिन्न चिदाभास को क्यों नहीं मान लेते हो। धीयुक्तस्य प्रवेशश्चैन्नैतरेये धियः पृथक् । आत्मा प्रवेशं संकल्प्य प्रविष्ट इति गीयते ॥३६॥