पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 364, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३४४ पञ्चदशी यह प्रज्ञानघन आत्मा पांच भूतों [से बने हुए इन देह इन्द्रिय आदि उपाधियों] के सहारे से उठ खड़ा होता है [अर्थात् जीवत्व का अभिमान करने लगता है] जब वे देहादि नष्ट होने लगते हैं तब वह भी उनके पीछे पीछे—उन्हीं के साथ हो जाता है [अथवा यों समझो कि उनके नष्ट हो जाने पर, उनके कारण किये हुए,जीवत्व के अभिमान को छोड़ देता है। अर्थात् जब ये देहादि नष्ट हो जाते हैं तब फिर उसका जीवत्व का अभिमान भी नहीं रहता] इस रीति से याज्ञवल्क्य ने मैत्रेयी स सोपाधिकरूप को— जिसको कि हम चिदाभास कहते हैं—स्पष्ट ही विनाशी बताया है। अविनाश्ययमात्मेति कूटस्थः प्रविवेचितः । मात्राऽसंसर्ग इत्येवमसङ्गत्वस्य कीर्तनात् ॥४०॥ 'अविनाशी वारेऽयमात्मानुच्छित्तिधर्मा' (बृ० ४-५-१४) इस श्रुति में कूटस्थ को उस [चिदाभास] से भिन्न बताया है। 'मात्रासंसर्गस्त्वस्य भवति' (बृ० ४-५-१४) इस श्रुति में आत्मा की असंगता का कीर्तन किया गया है कि—मात्रा अर्थात् देहादि से इस आत्मा का संसर्ग कभी भी—देह धारण करने पर भी नहीं हो पाता [आत्मा की यह असंगता ही आत्मा के अविनाशी होने का कारण है।] जीवापेतं वाव किल शरीरं म्रियते न सः । इत्यत्र न विमोक्षोऽर्थः किन्तु लोकान्तरे गतिः ॥४१॥ 'जीवापेतं वाव किल शरीरं म्रियते न जीवो म्रियते' (छा० ६-११-३) जीव से छोड़ा हुआ यह शरीर ही मरा करता है जीव नहीं मरता। इस श्रुति में मोक्ष का वर्णन नहीं है किन्तु इसमें तो लोकान्तर की गति का वर्णन किया गया है।