पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 365, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंकूटस्थदीपप्रकरणम् ३४५ नाहं ब्रह्मेति बुध्येत स विनाशीति चेन्न तत् । सामानाधिकरण्यस्य बाधायामपि संभवात् ॥४२॥ प्रश्न यह है कि—वह चिदाभास यदि विनाशी है तो फिर वह अपने को यह कैसे जानेगा कि मैं ब्रह्म हूँ ? क्योंकि विनाशी और अविनाशी दो पदार्थ एक कैसे हो सकेंगे ? इसका उत्तर यह है कि सामानाधिकरण्य तो बाधा में भी हो जाता है । सामानाधिकरण्य दो प्रकार होता है—एक मुख्य सामा- नाधिकरण्य, दूसरा बाधसामानाधिकरण्य । सो यहां मुख्य सामानाधिकरण्य न सही, बाधा में सामानाधिकरण्य तो हो ही सकता है । अपने जीवभाव की बाधा करके ब्रह्मभाव का ज्ञान उसे हो ही सकता है । योऽयं स्थाणुः पुमानेष पुंधिया स्थाणुधीरिव । ब्रह्मास्मीति धिया शेषाप्यहंबुद्धि र्निवर्त्यते ॥४३॥ 'यह जो स्थाणु है यह तो पुरुष है' इस वाक्य में जैसे पुरुषज्ञान से स्थाणुज्ञान निवृत्त हो जाता है, इसी प्रकार मैं ब्रह्म हूं' इस बुद्धि से 'मैं कर्ता हूं मैं भोक्ता हूं' इत्यादि सभी क्षुद्र बुद्धियां निवृत्त हो जाती हैं। ['पूर्ण अहं' से 'क्षुद्र अहं' मार डाला जाता है] नैष्कर्म्यसिद्धावप्येवमाचार्यैः स्पष्टमीरितम् । सामानाधिकरण्यस्य बाधार्थत्वमतोऽस्तु तत् ॥४४॥ वार्तिककार ने नैष्कर्म्य सिद्धि में यह बात स्पष्ट कही है कि—सामानाधिकरण्य बाध के लिये भी होता है । इस कारण 'मैं ब्रह्म हूँ'—इस वाक्य में जो सामानाधिकरण्य है वह बाधा- र्थक होही सकता है