पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 366, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३५६ पञ्चदशी सर्वं ब्रह्मेति जगता सामानाधिकरण्यवत् । अहं ब्रह्मेति जीवेन समानाधिकृतिर्भवेत् ॥४५॥ जैसे 'सर्वं खल्विदं ब्रह्म' इस श्रुति में जगत् के साथ बाधा में भी सामानाधिकरण्य देखा गया है, इसी प्रकार 'अहं ब्रह्म' इस वाक्य में जीव के साथ भी सामानाधिकरण्य हो ही सकता है। सामानाधिकरण्यस्य बाधार्थत्वं निराकृतम् । प्रयत्नतो विवरणे कूटस्थस्य विवक्षया ॥४६॥ विवरणाचार्य ने जो बाधसामानाधिकरण्य का प्रयत्न- पूर्वक खण्डन किया है उसका कारण तो यह है, कि उन्होंने तो अहं शब्द का अर्थ कूटस्थ लिया है और यों सामानाधिकरण्य का खण्डन करडाला है। शोधितत्वंपदार्थो यः कूटस्थो ब्रह्मरूपताम् । तस्य वक्तुं विवरणे तथोक्त मितरत्र च ॥४७॥ जिस कूटस्थ के त्वं पदार्थ का शोध कर लिया गया हो [त्वं पद के लक्ष्य जिस कूटस्थ को बुद्धि आदियों से विविक्त कर लिया गया हो] उसी को ब्रह्मरूप बताने के लिये विवरण में तथा अन्य ग्रन्थों में बाधसामानाधिकरण्य को हटाकर मुख्य सामानाधिकरण्य को कहदिया है देहेन्द्रियादियुक्तस्य जीवाभासभ्रमस्य या । अधिष्ठानचितिः सैषा कूटस्थात्र विवक्षिता ॥४८॥ देह इन्द्रिय और मनसे [ किंवा दोनों शरीरों से ] युक्त जो जीवाभास रूपी भ्रम है, उस भ्रमका अधिष्ठान जो चैतन्य है, उसी को तो वेदान्तों में 'कूटस्थ' कहा है।