पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 367, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंकूटस्थदीपप्रकरणम् १४७ जगद्भ्रमस्य सर्वस्य यदधिष्ठानमीरितम् । त्रय्यन्तेषु तदत्र स्याद् ब्रह्मशब्दविवक्षितम् ॥४९॥ तथा वेदान्तों में जिसको इस सब जगत् की कल्पना का अधिष्ठान बताया गया है, उसीको यहां 'ब्रह्म' शब्द से कहा गया है [ जीवत्वरूपी भ्रमका अधिष्ठान चेतन 'कूटस्थ' है तथा जगद्रूपी भ्रम का अधिष्ठान जो चेतन है वह 'ब्रह्म' शब्द से कहा जाता है ] एकस्मिन्नेव चैतन्ये जगदारोप्यते यदा । तदा तदेकदेशस्य जीवाभासस्य का कथा ॥५०॥ जब एकही चैतन्य में इस समस्त जगत् का आरोप किया जाता है, तब उसी जगत् के एक भाग जीवाभास [चिदाभास] का तो कहना ही क्या ? [ उसको भी उसी में आरोपित मान लेना चाहिये] जगत्तदेकदेशाख्यसमारोप्यस्य भेदतः । तत्त्वंपदार्थों भिन्नौ स्तो वस्तुतस्त्वेकता चितेः ॥५१॥ जगत् और जगत् का एक देश [ आभास ] कहाने वाला जो आरोपणीय पदार्थ है, उसके भेद की वजह से ही 'तत्' और 'त्वं' पदार्थ भिन्न भिन्न हैं। असल में तो 'चिति' एक ही है। यों उनमें औपाधिक तो भेद हैं तथा वास्तव एकता ही है। [जगत् का ध्यान करें तब उस चेतन को तत् अर्थात् ब्रह्म कहते हैं, देह इन्द्रिय आदि का ध्यान करें तब उस चेतन को त्वं अर्थात् कूटस्थ कहते हैं। जगत् को और देहादि को भूल जांय तो अकेला चेतन ही चेतन शेष रहजाता है]