पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 368, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३४८ पञ्चदशी कर्तृत्वादीन् बुद्धिधर्मान् स्फूर्त्याख्यां चात्मरूपताम् । दधद् विभाति पुरत आभासोऽतो भ्रमो भवेत् ॥५२॥ यह जो आभास है यह कर्तृत्व भोक्तृत्व प्रमातृत्व आदि बुद्धि के धर्मों को तथा स्फूर्ति नामके आत्माके धर्म को धारण किये हुये, सामने दीख पड़ता है इससे भ्रम हो ही जाता है [भ्रम स्थल की चांदी में जैसे अधिष्ठान और आरोप्य दोनों ही के धर्म दीखते हैं और वह आरोपित [कल्पित] मानी जाती है इसी प्रकार दोनों के धर्म दीखने से ही यह आभास कल्पित है। का बुद्धिः कोऽयमाभासः को वात्मात्र जगत् कथम् । इत्यनिर्णयतो मोहः सोऽयं संसार इष्यते ॥५३॥ बुद्धि क्या वस्तु है ? आभास कौन है इन सब में आत्मा नाम का पदार्थ कौन सा है? यह जगत् कैसे बन गया है? इन सब बातों के स्वरूप का निर्णय जब कोई नहीं कर पाता तब उसे मोह हो जाता है । बस इसी को संसार कहते हैं [ मुमुक्षु लोगों को इसी मोह को हटाना है यही मोह सब अनर्थों का मूल कारण है ] बुद्ध्यादीनां स्वरूपं यो विविनक्ति स तत्ववित् । स एव मुक्त इत्येवं वेदान्तेषु विनिश्चयः ॥५४॥ बुद्धि आदि के स्वरूप का विवेक जो कर लेता है [ बुद्धि आभास आत्मा और जगत् इन चारों को अलग अलग छांट कर जो रख लेता है] वही ज्ञानी है, वही मुक्त है, [उसी का अनर्थों से छुटकारा हो सकता है ] यही वेदान्तों का निश्चय है ।