भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 369

कूटस्थदीपप्रकरणम् ३४९ एवं च सति बन्धः स्यात् कस्येत्यादिकुतर्कजाः । विडम्बना दृढं खण्ड्याः खण्डनोक्तिप्रकारतः ॥५५॥ जब कि बन्ध भी अविवेकमूलक ही है और मोक्ष भी अविवेकमूलक ही है, तब फिर अद्वैतवाद में किस का बन्ध और किसका मोक्ष होता है ? इत्यादि तार्किकों के किये हुए कुतर्क- मूलक परिहासों का परिहार खण्डन नामक ग्रन्थ में लिखी हुई विधि से करना चाहिये । वृत्तेः साक्षितया वृत्तिप्रागभावस्य च स्थितः । बुभुत्सायां तथाऽज्ञोऽसीत्याभासाज्ञानवस्तुनः ॥५६॥ पुराणों में कहा है कि—कामादिवृत्तियों की उत्पत्ति जब हो जाती है तब तो यह शिव उन वृत्तियों का साक्षी बन कर रहता है, वृत्तियों के उदय होने से पहले वृत्ति के प्रागभाव का साक्षी होकर रहता है,जब आत्मजिज्ञासा होती है तब जिज्ञासा का साक्षी हो जाता है, उससे पहले तो यह शिव 'मैं अज्ञानी हूँ' इस रूप से अनुभव में आने वाले अज्ञान का साक्षी बन कर बैठा रहता है । असत्यालम्बनत्वेन सत्यः, सर्वजडस्य तु । साधकत्वेन चिद्रूपः, सदा प्रेमास्पदत्वतः ॥५७॥ आनन्दरूपः, सर्वार्थसाधकत्वेन हेतुना । सर्वसम्बन्धवत्वेन संपूर्णः शिवसंज्ञितः ॥५८॥ वह शिव क्योंकि इस असत्य जगत् का आलम्बन [अधि- ष्ठान] है इसी से 'सत्य' है, सब जडों का साधक किंवा अव- भासक होने से ही वह 'चिद्रूप' है, सदा प्रेम का विषय होने से ही वह 'आनन्दरूप' है, सब अर्थों का साधक होने से तथा