पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 374, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३५२ पञ्चदशी प्रत्युत सम्पूर्ण वेदान्त एकस्वर होकर इस कूटस्थ को ही वास्तव पदार्थ कह रहे हैं । वे इस कूटस्थ के प्रतिपक्षी किसी भी पदार्थ को सहन नहीं करते हैं । श्रुत्यर्थं विशदीकुर्मो न तर्काद्वच्मि किंचन । तेन तार्किकशङ्काना मत्र कोऽवसरो वद ॥६७॥ हम तो केवल श्रुति के तात्पर्य को ही विशद् करते हैं । तर्क के सहारे से तो हम कुछ भी नहीं कहते हैं । ऐसी अवस्था में तार्किकों की शंकाओं का यहां अवसर ही कौनसा है ? इस धातु का प्रयोग बहुवचन में न आने के कारण 'वच्मि' यह प्रयोग किया है । तस्मात् कुतर्कं सन्त्यज्य मुमुक्षुः श्रुति माश्रयेत् । श्रुतौ तु माया जीवेशौ करोतीति प्रदर्शितम् ॥६८॥ इस कारण मुमुक्षु को चाहिये कि—इस दुरवगाह आत्म- तत्त्व को जानने के लिये कुतर्क को छोड़कर श्रुति का आश्रय ले ले । श्रुतियों में तो जीवेश्वरों को मायिक कहा ही है । ईक्षणादिप्रवेशान्ता सृष्टिरीशकृता भवेत् । जाग्रदादिविमोक्षान्तः संसारो जीवकर्तृकः ॥६९॥ ईक्षण से लेकर प्रवेश तक की सृष्टि तो ईश्वर की बनायी हुई है । जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति, बन्ध तथा मोक्षरूपी संसार को जीव ने बना लिया है । [इसका स्पष्टीकरण तृप्तिदीप के चतुर्थ श्लोक में है] असङ्ग एव कूटस्थः सर्वदा नास्य कश्चन । भवत्यतिशयस्तेन मनस्येवं विचार्यताम् ॥७०॥ मुमुक्षु लोग इस बात को अपने मन में सदा ही विचारा