पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 375, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंकूटस्थदीपप्रकरणम् ३५३ करें कि यह कूटस्थ तो असङ्ग ही रहता है । [ जन्म जरा रोग और मृत्यु अनादि काल से क्रमानुसार बराबर होते चले आ रहे हैं परन्तु ] इन सब से इस कूटस्थ तत्व में कभी कुछ भी अतिशय नहीं हो पाता है [यह तो सदा वैसे का वैसा ही बना रहता है] । न निरोधो न चोत्पत्ति र्न बद्धो न च साधकः । न मुमुक्षु र्न वै मुक्त इत्येषा परमार्थता ॥७१॥ सब झंझट को छोड़कर परमार्थ का निचोड़ पूछो तो इतना ही है किः—मरण और जन्म कुछ चीज़ ही नहीं हैं। बद्ध और साधक कोई होता ही नहीं है। मुमुक्षु और मुक्त किसी को कह ही नहीं सकते हैं । अवाङ्मनसगम्यं तं श्रुतिर्बोधयितुं सदा । जीवमीशं जगद् वापि समाश्रित्य प्रबोधयेत् ॥७२॥ वाणी और मन से अगम्य उसी तत्व का बोध कराने के लिये श्रुति भगवती 'जीव' या 'ईश्वर' या 'जगत्' इन तीनों में से किसी एक को पकड़ कर, उस मन वाणी के अगम्य तत्व का बोध करा देती है । [मन वाणी के अगम्य उस तत्व का बोध कराने के लिये श्रुतियों में 'जीव' 'ईश्वर' तथा 'जगत्' के स्वरूप का प्रतिपादन जहां तहां किया गया है । उसका परमतात्पर्य तो जिस किसी प्रकार उस अगम्य तत्व का बोध कराने में ही है।] यया यया भवेत् पुंसां व्युत्पत्तिः प्रत्यगात्मनि । सा सैव प्रक्रियेह स्यात् साध्वीत्याचार्यभाषितम् ॥७३॥ २४