भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 403, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 403

[Header] ध्यानदीपप्रकरणम् ३८१

विरोधी विचारों का त्याग करके जब निरन्तर भावना की जाती है तब संस्कारों की प्रबलता हो जाने से सपने आदि में भी ध्यान होने लग जाता है । भुञ्जानोऽपि निजारब्धमास्थातिशयतोऽनिशम् । ध्यातुं शक्तो न संदेहो विषयव्यसनी यथा ॥८३॥ यदि किसी को अपने उपास्य में अधिक श्रद्धा हो तो अपने प्रारब्ध को भोगते हुए भी विषयव्यसनी की तरह, निरन्तर उपा- सना कर ही सकता है, इसमें सन्देह मत करो । परव्यसनिनी नारी व्यग्रापि गृहकर्मणि । तदेवास्वादयत्यन्तः परसंगरसायनम् ॥८४॥ लोक में भी देख लो कि—जिस नारी को परपुरुष का व्यसन पड़ जाता है, वह घर के [लेपन संमार्जन आदि] कामों में लगी रहने पर भी, अपने मन से उसी परसंगरसायन का मज़ा चखा करती है । परसङ्गं स्वादयन्या अपि नो गृहकर्म तत् । कुण्ठीभवेदपि त्वेतदापातेनैव वर्तते ॥८५॥ परसंग का स्वाद लेने वाली उस नारी के घर के काम भी बन्द नहीं हो जाते । वे भी बराबर चलते ही रहते हैं । उसके ये काम तो ऊपर के मन से होते जाते हैं । गृहकृत्यव्यसनिनी यथा सम्यक् करोति तत् । परव्यसनिनी तद्वन्न करोत्येव सर्वथा ॥८६॥ अपने घर के कामों का ही जिस नारी को व्यसन है, वह जैसे घर के काम भले प्रकार [जी लगाकर] करती है, परव्यस- निनी नारी उसकी तरह घर के काम प्रेम से करती ही नहीं ।