पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 402, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३८० पञ्चदशी यहीं चिन्तन को समाप्त कर दो और मरणपर्यन्त इस धारणा को बनाये रक्खो । ब्रह्मचारी भिक्षमाणो युतः संवर्गविद्यया । संवर्गरूपतां चित्ते धारयित्वा ह्यभिक्षत ॥७९॥ उपासक भी उपास्य रूप का अभिमान कर लेता है यह बात शास्त्र में देखी गयी है—संवर्ग गुणवाले प्राण की उपासना करने वाला कोई ब्रह्मचारी, जब भिक्षा करने चला तो उसने अभिप्रतारि राजा के सामने अपने आप को संवर्ग रूप मानकर ही भिक्षा की थी । यह बात छान्दोग्य में है । पुरुषस्येच्छया कर्तु मकर्तुं कर्तुमन्यथा । शक्योपास्तिरतो नित्यं कुर्यात् प्रत्ययसन्ततिम् ॥८०॥ उपासना तो पुरुष की इच्छा पर निर्भर रहती है । वह चाहे करे, चाहे न करे, चाहे तो उलट पुलट कर डाले । इस लिये उपासना तो सदा ही करनी चाहिये । [ उसे मरण-पर्यन्त छोड़ना नहीं चाहिये ] वेदाध्यायी ह्यप्रमत्तोऽधीते स्वप्नेऽधिवासतः। जपिता तु जपत्येव तथा ध्यातापि वासयेत् ॥८१॥ जो सावधान वेदपाठी है, या जो सदा जप करता रहता है, वह दृढ वासना के कारण सुपने में भी वेदपाठ या जप किया ही करता है । इसी प्रकार उपासक लोग भी उपासना की वासना को इतना दृढ करें कि सुपने आदि में भी उसी का ध्यान आने लग पड़े । विरोधिप्रत्ययं त्यक्त्वा नैरन्तर्येण भावयन् । लभते वासनावेशात् स्वप्नादावपि भावनाम् ॥८२॥