भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ध्यानदीपप्रकरणम् ३७९ विचाराज्जायते बोधोऽनिच्छा यं न निवर्तयेत् । स्वोत्पत्तिमात्रात् संसारे दहत्यखिलसत्यताम् ॥७५॥ बोध तो विचार से उत्पन्न हुआ करता है, मुझे बोध न हो यह चाहने पर भी उस बोध को कोई रोक नहीं सकता । वह बोध ज्यों ही उत्पन्न हो जाता है त्यों ही इस संसार की सत्यता को जला देता है [ नष्ट कर देता है ] तावता कृतकृत्यः सन्नित्यतृप्तिमुपागतः । जीवन्मुक्ति मनुप्राप्य प्रारब्धक्षयमीक्षते ॥७६॥ तत्वज्ञान के उत्पन्न हो जाने से ही नित्यतृप्ति अर्थात् सर्वा- धिक सुख को पाकर, जीवन्मुक्ति का महालाभ करके, अपने प्रारब्ध क्षय की बाट जोहने लगता है । आप्तोपदेशं विश्वस्य श्रद्धालु रविचारयन् । चिन्तयेत् प्रत्ययैरन्यै रनन्तरितवृत्तिभिः ॥७७॥ गुरु के उपदेश पर [ जिनमें उसने उपास्य के स्वरूप का प्रतिपादन किया हो ] विश्वास करके, स्वयं उस पर कुछ भी विचार न करके, अपने उपास्यतत्व का निरन्तर चिन्तन करे । ध्यान न रहे कि—इस चिन्तन के बीच में अन्य किसी भी विषय का विचार न आने पाये । यावच्चिन्त्यस्वरूपत्वाभिमानः स्वस्य जायते । तावद् विचिन्त्य, पश्चाच्च तथैवामृति धारयेत् ॥७८॥ ऐसा चिन्तन कब तक करते जायें सो भी सुनो—चिन्तन करते करते ऐसी अवस्था आ जायगी, कि तुम्हें स्वयं ही यह भाव होने लगेगा कि यह चिन्त्य स्वरूप तो स्वयं मैं ही हूँ। बस