पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 400, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३७८ पंचदशी विरोध नहीं है [ निर्गुणता में विरोध तो किसी सगुण मूर्ति से होता । इससे यह निर्गुणोपासना ही है] ऐसा यदि तू समझं गया है तो तू सन्तोष कर [ तुझे तत्व का ज्ञान हो चुका है ] गुणानां लक्षकत्वेन न तत्वेऽन्तः प्रवेशनम् । इति चेदस्त्वेवमेव ब्रह्मतत्वमुपास्यताम् ॥७२॥ आनन्दादि या अस्थूलादि जो गुण हैं वे तो वस्तु के लक्षक होते हैं [ वे वस्तु की तरफ को संकेत ( इशारा ) भर कर सकते हैं—वे उसके स्वरूप नहीं होते हैं ] वे उपास्य तत्व के अन्दर तक प्रवेश नहीं करते हैं, ऐसा यदि कहो तो हम कहेंगे कि हां ठीक है । ऐसे लक्षित ब्रह्म की ही उपासना किया करो कि गुण उस के अन्दर तक नहीं प्रविष्ट होते हैं [ यों तुम लक्षित ब्रह्म की ही उपासना किया करो ] आनन्दादिभि रस्थूलादिभिश्चात्मात्र लक्षितः । अखण्डैकरसः सोहमस्मीत्येव मुपासते ॥७३॥ उपासना की रीति यह है—इन श्रुतियों में जो अखण्डैकरस आत्मा आनन्द आदि तथा अस्थूल आदि गुणों से लक्षित किया गया है, मुमुक्षु लोग उस की उपासना 'सोऽहमस्मि' वही मैं हूँ इस रूप में किया करते हैं । बोधोपास्त्यो र्विशेषः क इति चेदुच्यते शृणु । वस्तुतन्त्रो भवेद् बोधः कर्तृतन्त्रमुपासनम् ॥७४॥ बोध और 'उपासना' में जो भेद है वह भी हमसे सुन लो— ज्ञान तो ज्ञेय वस्तु के अधीन हुआ करता है । उसके विपरीत उपासना कर्ता के अधीन होती है ।