पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें[header] ध्यानदीपप्रकरणम् ३७७ [/header]
कर लेना चाहिए । यह बात 'आनन्दादयः प्रधानस्य' ( वेदान्त ३-३-११) [ प्रधान जो ब्रह्मतत्व है उसके जो आनन्द आदि धर्म हैं उनका उपसंहार सभी जगह कर लेना चाहिए ] इस सूत्र में व्यासदेव ने कही है। अस्थूलादेर्निषेध्यस्य गुणसंघस्य संहृतिः । तथा व्यासेन सूत्रेऽस्मिन्नुक्ताऽक्षरधियां त्विति ॥६९॥ अस्थूल [ अनणु, अह्रस्व, अद्देश्य, अग्राह्य, अशब्द, अस्पर्श, अरूप, तथा अव्यय ] आदि जो भी निषेध्य गुण हैं, जो जहां तहां अध्यात्मशास्त्र में कहे गये हैं, उन सब का भी उपसंहार इस उपासना में कर लेना चाहिये। यह बात 'अक्षरधियां त्ववरोधः सामान्यतद्भावाभ्या मौपसदनवत्तदुक्तम् (वेदान्त ३-३-३३) इस सूत्र में व्यासदेव ने कही है। अक्षर ब्रह्म में द्वैत का निषेध करने वाली जो बुद्धियां हैं उनको सब ही निषेधों में उपसंहार कर डालना चाहिये । निर्गुणब्रह्मतत्वस्य विद्यायां गुणसंहृतिः । न युज्येतेत्युपालम्भो व्यासं प्रत्येव मां न तु ॥७०॥ 'निर्गुण ब्रह्म की विद्या में गुणों का उपसंहार तो ठीक ही नहीं है। क्योंकि गुणों का उपसंहार निर्गुण विद्यापन का विरोधी है' यह आक्षेप व्यासदेव पर ही करना चाहिये,मुझ पर नहीं। मैंने तो केवल उनके कहे गुणोपसंहार का कथन कर दिया है। हिरण्यश्मश्रुसूर्यादिमूर्तीनामनुदाहृतेः । अविरुद्धं निर्गुणत्वमिति चेत् तुष्यतां त्वया ॥७१॥ हिरण्यश्मश्रु युक्त सूर्य आदि सगुण मूर्तियों का कथन न होने से, इस अस्थूलता आदि के होने पर भी निर्गुणता में कोई