पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३७६ पञ्चदशी देखकर खेती की उपासना करने लगे। परन्तु उन्हें देखकर मन्त्रों का जप करनेवाले लोग अपने मन्त्रानुष्ठान को छोड़ नहीं बैठते हैं। इसी प्रकार जिन्हें सांसारिक फलों की चाह लगी हुई है, वे अगर निर्गुणोपासना का अनुष्ठान नहीं करते हैं, तो भी मुमुक्षु लोग निर्गुणोपासना को नहीं छोड़ सकते हैं। तिष्ठन्तु मूढाः प्रकृता निर्गुणोपास्तिरीर्यते । विद्यैक्यात् सर्वशाखास्थान् गुणानत्रोपसंहरेत् ॥६७॥ मूढ लोगों की बातों को यहीं छोड़कर, अब प्रकृत निर्गुणो- पासना का कथन किया जाता है। ['सर्ववेदान्तप्रत्ययं चोदनाद्य- विशेषात्' (वेदान्त ३-३-१) जो जो उपासनायें जहां तहां वेदान्तों में बिखरी पड़ी हैं, क्योंकि चोदना सब जगह एक सी ही है, इस कारण उन उपासनाओं में कोई भी भेद नहीं है]। इस व्याससूत्र के अनुसार निर्गुणोपासना नाम की विद्या तो एक ही है। इस कारण भिन्न-भिन्न शाखाओं में वर्णित उन उन सब उपास्य गुणों को, इसी उपासना में इकट्ठे करके उपा- सना करनी चाहिये । आनन्दादेर्विधेयस्य गुणसङ्घस्य संहृतिः । आनन्दादय इत्यस्मिन् सूत्रे व्यासेन वर्णिता ॥६८॥ वे गुण दो प्रकार के हैं—एक 'विधेय' दूसरे 'निषेध्य' । उनमें आनन्द, [विज्ञान, नित्य, शुद्ध, बुद्ध, सत्य, मुक्त, निर- ञ्जन, विभु, अद्वितीय, आनन्द, पर, प्रत्यगेकरस ] इत्यादि जो जो भी विधेय गुण हैं, उन सबका उपसंहार इस उपासना में