पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३८४ पञ्चदशी तो घटादि भी यह चाहेंगे कि हम में भी बुद्धि को बार बार लगाया जाय ] । घटादौ निश्चिते बुद्धिर्नश्यत्येव, यदा घटः । इष्टो नेतुं तदा शक्य इति चेत् सममात्मनि ॥९४॥ घटादि का निश्चय जब होजाता है तब घटज्ञान नष्ट तो हो जाता है [ अथवा यों समझो कि घटादिज्ञान क्षणिक तो हैं ] परन्तु फिर जब कभी घट की ज़रूरत हो तभी उस घट को ले जा सकते हैं [उसमें चित्त को स्थिर किये रखने की ज़रूरत नहीं होती ] तो हम कहेंगे कि—यही बात आत्मा के विषय में भी समझ लो । [ उसमें भी चित्त को स्थिर कर रखने की कोई आवश्यकता नहीं होती है ] । निश्चित्य सकृदात्मानं यदापेक्षा तदैव तम् । वक्तुं मन्तुं तथा ध्यातुं शक्नोत्येव हि तत्ववित् ॥९५॥ [ इस बात को आत्मा के विषय में यों समझो कि ] जब एक बार आत्मा के स्वरूप का निश्चय होजाता है, तब फिर जब कभी अपेक्षा होती है तभी उसके विषय का कथन, मनन या ध्यान ज्ञानी लोग कर ही सकते हैं । उपासक इव ध्यायन् लौकिकं विस्मरेद् यदि । विस्मरत्वेव सा ध्यानाद् विस्मृतिर्न तु वेदनात् ॥९६॥ तत्त्वज्ञानी लोग भी, ध्यान करते करते, यदि उपासकों के समान ही, लौकिक बातों को भूलते हैं, तो भूल जायें । उनका यह विस्मरण ध्यान की प्रबलता से है, यह विस्मरण ज्ञान के कारण नहीं है ।