भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 406, कुल 726 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 406

३८४ पञ्चदशी तो घटादि भी यह चाहेंगे कि हम में भी बुद्धि को बार बार लगाया जाय ] । घटादौ निश्चिते बुद्धिर्नश्यत्येव, यदा घटः । इष्टो नेतुं तदा शक्य इति चेत् सममात्मनि ॥९४॥ घटादि का निश्चय जब होजाता है तब घटज्ञान नष्ट तो हो जाता है [ अथवा यों समझो कि घटादिज्ञान क्षणिक तो हैं ] परन्तु फिर जब कभी घट की ज़रूरत हो तभी उस घट को ले जा सकते हैं [उसमें चित्त को स्थिर किये रखने की ज़रूरत नहीं होती ] तो हम कहेंगे कि—यही बात आत्मा के विषय में भी समझ लो । [ उसमें भी चित्त को स्थिर कर रखने की कोई आवश्यकता नहीं होती है ] । निश्चित्य सकृदात्मानं यदापेक्षा तदैव तम् । वक्तुं मन्तुं तथा ध्यातुं शक्नोत्येव हि तत्ववित् ॥९५॥ [ इस बात को आत्मा के विषय में यों समझो कि ] जब एक बार आत्मा के स्वरूप का निश्चय होजाता है, तब फिर जब कभी अपेक्षा होती है तभी उसके विषय का कथन, मनन या ध्यान ज्ञानी लोग कर ही सकते हैं । उपासक इव ध्यायन् लौकिकं विस्मरेद् यदि । विस्मरत्वेव सा ध्यानाद् विस्मृतिर्न तु वेदनात् ॥९६॥ तत्त्वज्ञानी लोग भी, ध्यान करते करते, यदि उपासकों के समान ही, लौकिक बातों को भूलते हैं, तो भूल जायें । उनका यह विस्मरण ध्यान की प्रबलता से है, यह विस्मरण ज्ञान के कारण नहीं है ।