भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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[Header: ध्यानदीपप्रकरणम् ३८५]

ध्यानं त्वैच्छिकमेतस्य वेदनान्मुक्तिसिद्धितः । ज्ञानादेव तु कैवल्यमिति शास्त्रेषु डिण्डिमः ॥९७॥ ध्यान करना तो तत्वज्ञानी की इच्छा पर निर्भर है [ वह चाहे तो करे, न चाहे तो न करे] तमेव विदित्वाऽतिमृत्युमेति नान्यः पन्था विद्यतेऽयनाय ( श्वे. ३-८ ) ज्ञात्वा देवं मुच्यते सर्वपापैः ( श्वे. २-१५ ) इत्यादि शास्त्र तो डंके की चोट यह कह रहे हैं कि कैवल्य तो अकेले ज्ञान से ही मिल जाता है [ उसके पाने के लिये ध्यान आदि किसी की भी आवश्यकता नहीं है ] तत्त्वविद् यदि न ध्यायेत् प्रवर्तेत तदा बहिः । प्रवर्त्ततां सुखेनार्यं को बाधोऽस्य प्रवर्त्तने ॥९८॥ 'तत्वज्ञानी लोग यदि ध्यान न करेंगे तो फिर बाहर प्रवृत्ति करेंगे ही' ऐसा यदि कोई कहे तो हम कहेंगे, तत्वज्ञानी लोग सुख-पूर्वक बाह्य कामों में प्रवृत्ति करें । उनकी प्रवृत्ति में कोई बाधा नहीं है । अतिप्रसङ्ग इति चेत् प्रसङ्गं तावदीरय । प्रसङ्गो विधिशास्त्रं चेन्न तत् तत्त्वविदं प्रति ॥९९॥ यदि कहो कि तत्वज्ञानी की बाह्यप्रवृत्ति मानने पर अति प्रसङ्ग हो जायगा । तो हम कहते हैं कि [ तुम्हारी बात का उत्तर तो हम पीछे से देंगे पहिले ] तुम प्रसङ्ग का अभिप्राय बताओ कि प्रसंग किसे कहते हैं ? यदि कहो कि विधि या निषेध शास्त्र को प्रसङ्ग कहते हैं । तो हम कहेंगे कि विधि या निषेध शास्त्र तो ज्ञानी के लिये होते ही नहीं [ वे तो अज्ञानी पर ही लागू होते हैं ]