पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 408, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें३८६ पञ्चदशी वर्णाश्रमवयोवस्थाभिमानो यस्य विद्यते । तस्यैव च निषेधाश्च विधयः सकला अपि ॥१००॥ जिस बेसमझ को देह के वर्ण, देह के आश्रम, देह की आयु, और देह की अवस्थाओं का अभिमान हुआ रहता है, [जो अज्ञानी इन सब को अपने ही माना करता है] ये सब विधि और निषेध शास्त्र केवल उसी के लिए होते हैं । वर्णाश्रमादयो देहे मायया परिकल्पिताः । नात्मनो बोधरूपस्येत्येवं तस्य विनिश्चयः ॥१०१॥ तत्वज्ञानी को तो ऐसा दृढ निश्चय हुआ रहता है कि— इन वर्णाश्रमादि को माया ने देह में ही कल्पित कर लिया है । ज्ञानरूप आत्मा के तो कोई भी वर्ण या आश्रमादि नहीं होते हैं। समाधिमथ कर्माणि मा करोतु करोतु वा । हृदयेनास्तसर्वास्थो मुक्त एवोत्तमाशयः ॥१०२॥ जिसने अपने जी से सम्पूर्ण आसक्तियों को निकाल कर फेंक दिया हो, जिसका आशय किंवा ज्ञान निर्मल हो चुका हो, वह तो मुक्त ही है। ऐसा महापुरुष समाधि करे या न करे, काम करे या न करे, [यह सब उसकी इच्छा पर ही निर्भर है। इस बारे में शास्त्र की जुरत उससे कुछ कहने की नहीं होती है] नैष्कर्म्येण न तस्यार्थ स्तस्यार्थोऽस्ति न कर्मभिः । न समाधानजप्याभ्यां यस्य निर्वासनं मनः ॥१०३॥ [औरों ने भी कहा है कि]—जिसका मन वासनाओं से रहित हो चुका है, कर्म को छोड़ बैठने या करते जाने से फिर उसे कुछ मतलब नहीं रहता । समाधि और जप से उसका कुछ प्रयोजन सिद्ध नहीं होता ।