भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 409

ध्यानदीपप्रकरणम् ३८७ आत्मासङ्गस्ततोऽन्यत् स्यादिन्द्रजालं हि मायिकम् । इत्यचंचलनिर्णीते कुतो मनसि वासना ॥१०४॥ आत्मा असंग पदार्थ है, उससे भिन्न सभी कुछ इन्द्रजाल के समान मायिक है । ऐसा स्थिर निर्णय कर चुकने के बाद मन में वासना कैसे उठेगी ? भाव यह है कि—तत्त्वज्ञानी के मन में वासना नहीं उठती । फिर बताओ कि वह उस वासना को हटाने के लिए ध्यान भी क्यों करेगा ? एवं नास्ति प्रसङ्गोऽपि कुतोऽस्यातिप्रसञ्जनम् । प्रसङ्गो यस्य तस्यैव शङ्क्येतातिप्रसञ्जनम् ॥१०५॥ [प्रकृत बात तो इतनी ही है कि] इस प्रकार जब ज्ञानी को प्रसङ्ग ही नहीं है तब फिर उसे अतिप्रसङ्ग कैसे हो जायगा ? यह अतिप्रसङ्ग तो उसी को होता है जिसको कि प्रसङ्ग का बन्धन हो। [प्रसङ्ग वाला पुरुष जब प्रसङ्ग की अवहेलना करता है तब वह उसकी अतिप्रसक्ति कही जाती है ।] विध्यभावान्न बालस्य दृश्यतेऽतिप्रसंजनम् । स्यात् कुतोऽतिप्रसङ्गोऽस्य विध्यभावे समे सति ॥१०६॥ [यह बात लोक में भी देखी जाती है] बालकों पर विधि- शास्त्र नहीं चलता तो उनकी अतिप्रसक्ति भी नहीं मानी जाती। ज्ञानी और बालक दोनों को ही विधि या निषेध शास्त्र का अभाव समान है। फिर इस विचारे ज्ञानी को ही अतिप्रसङ्ग कैसे हो जायगा ? न किञ्चिद्वेत्ति बालश्चेत् सर्वं वेत्येव तत्त्ववित् । अल्पज्ञस्यैव विधयः सर्वे स्यु र्नान्ययोर्द्वयोः ॥१०७॥ यदि कहो कि बालक तो कुछ भी नहीं जानता ।