भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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तत्त्वविवेकप्रकरणम् २३ बन जाता है उस ब्रह्म को ही तत्त्वमसि के 'तत्' शब्द से कहा जाता है । सच्चिदानन्दस्वरूप जो ब्रह्म तमोगुण प्रधान माया को लेकर [ उसको उपाधि भाव से स्वीकार करके ] तो इस चराचरात्मक जगत् का उपादान [ अथवा अध्यास का अधिष्ठान ] हो जाता है, तथा विशुद्धसत्त्वप्रधान उसी माया को लेकर [ उसको अपनी उपाधि मानकर ] निमित्त [ किंवा उपादानादि को जाननेवाला कर्त्ता ] हो जाता है, वह निमित्त तथा उपादान उभयरूपी 'ब्रह्म' ही 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों के 'तत्' पद से कहा गया है । घट आदि पदार्थों के जैसे निमित्त और उपादान कारण अलग अलग होते हैं, वैसे जगत् का निमित्त और उपादान पृथक् पृथक् नहीं है । यदा मलिनसत्त्वां तां कामकर्मादिदूषिताम् । आदत्ते तत्परं ब्रह्म त्वंपदेन तदोच्यते ॥४५॥ वही ब्रह्म जिस अवस्था में मलिनसत्त्वप्रधान होने के कारण ही कामकर्मादि से दूषित उस अविद्या नामवाली माया को उपाधिभाव से स्वीकार कर बैठता है तब उसी ब्रह्म को 'त्वं' पद से कहा जाने लगता है । त्रितयीमपि तां मुक्त्वा परस्परविरोधिनीम् । अखण्डं सच्चिदानन्दं महावाक्येन लक्ष्यते ॥४६॥ परस्पर विरुद्ध उस तीन प्रकार की माया को छोड़ देने पर तो तत्त्वमसि आदि महावाक्य अखण्ड सच्चिदानन्द ब्रह्म को लक्षित कर देते हैं । तमःप्रधान, विशुद्धसत्त्वप्रधान और मलिनसत्त्वप्रधान इन तीनों प्रकार की परस्परविरोधिनी उस पूर्वोक्त माया का जब