पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२४ पञ्चदशी परित्याग कर दिया जाता है, उस समय तत्त्वमसि आदि महा- वाक्य आते हैं और अधिकारी के सामने भेदरहित सच्चिदानन्द ब्रह्म को लक्षित करके चले जाते हैं। अनधिकारी लोग उस समय पागलों की तरह देखते ही रह जाते हैं। सोयमित्यादिवाक्येषु विरोधात्तदिदन्तयोः । त्यागेन भागयोरेक आश्रयो लक्ष्यते यथा ॥४७॥ 'सोयंदेवदत्तः' इत्यादि वाक्यों में 'तत्ता' और 'इदन्ता' का विरोध होने से इन दोनों विरोधी भागों का त्याग करके, इनके आश्रय, एक देवदत्त की लक्षणा जैसे हो जाती है— 'यह वह देवदत्त है' इस वाक्य में 'यह' का मतलब है, इस देश और इस काल का देवदत्त तथा 'वह' का मतलब होता है उस देश तथा उस काल का देवदत्त । यों 'यहपन' और 'वहपन' नाम के धर्मों का विरोध होने से, जब देवदत्त की एकता नहीं हो सकती, तब इन दोनों विरोधी भागों का त्याग करके, देवदत्त रूपी एक आश्रय का बोध जैसे लक्षणा से हो जाता है— मायाविद्ये विहायैवमुपाधी परजीवयोः । अखण्डं सच्चिदानन्दं परं ब्रह्मैव लक्ष्यते ॥४८॥ ठीक इसी प्रकार 'पर' और 'जीव' की जो उपर्युक्त 'माया' तथा 'अविद्या' नाम की उपाधि हैं उन दोनों को छोड़ देने पर अखण्ड [अर्थात् भेदरहित] सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म ही महा- वाक्यों से लक्षित हो जाता है। संविकल्पस्य लक्ष्यत्वे लक्ष्यस्य स्यादवस्तुता । निर्विकल्पस्य लक्ष्यत्वं न दृष्टं न च संभवि ॥४९॥ प्रश्न—जिस तत्व को तुम महावाक्य का लक्ष्य बताते हो, वह