भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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पृष्ठ 416

३९४ पञ्चदशी जो पुरुष संवादिभ्रम से किसी वस्तु को उठाने दौड़ा है, उसे [उस भ्रम से प्रमाज्ञान नहीं होता किन्तु उसे] किसी दूसरे प्रमाण से प्रमाज्ञान हो जाता है। ऐसा यदि कहो तो हम कहेंगे कि इसी प्रकार उपासना भी स्वयं तो ब्रह्मज्ञान नहीं हो जाती। किन्तु दूसरे ज्ञान का कारण बन जाती है। [अर्थात् निर्गुणोपा- सना निदिध्यासन रूप होकर अपरोक्ष ज्ञान को उत्पन्न कर देती है।] मूर्तिध्यानस्य मन्त्रादेरपि कारणता यदि। अस्तु नाम तथाप्यत्र प्रत्यासत्तिर्विशिष्यते ॥१२५॥ यदि कहो कि—यों तो [चित्त की एकाग्रता के सम्पादन के द्वारा] मूर्ति का ध्यान या मन्त्रादि भी अपरोक्षज्ञान के कारण होते हैं तो हम इस बात को स्वीकार करते हैं। परन्तु इस निर्गुणोपासना में इतनी विशेषता है कि यह उपासना ज्ञान के सबसे अधिक समीप होती है। निर्गुणोपासनं पक्कं समाधिः स्याच्छनैस्ततः। यः समाधिर्निरोधाख्यः सोऽनायासेन लभ्यते ॥१२६॥ [वह निर्गुणोपासना ज्ञान के समीप यों है कि] यह निर्गुणोपासना जब पकने लगती है तब इसकी सविकल्प समाधि हो जाती है। फिर उस सविकल्प समाधि की ही निर्विकल्प समाधि बन जाती है। यह निरोध नाम की समाधि निर्गुणो- पासक को अनायास ही प्राप्त हो जाती है। निरोधलाभे पुंसोऽन्तरसङ्गं वस्तु शिष्यते। पुनः पुनर्वासितेऽस्मिन् वाक्याज्जायेत तत्त्वधीः ॥१२७॥ निरोध का लाभ हो जाने पर किंवा निर्विकल्प समाधि हो