पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 417, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्यानदीपप्रकरणम् ३९५ जाने पर, पुरुष के अन्दर असंग वस्तु शेष रह जाती है । इस असंग वस्तु की भावना जब बार बार की जाती है तब तत्वमसि आदि वाक्यों से तत्वज्ञान [ कि ब्रह्मनाम का सत्य मैं ही हूँ यह ज्ञान ] उत्पन्न हो ही जाता है । निर्विकारासङ्गनित्यस्वप्रकाशैकपूर्णताः । बुद्धौ झटिति शास्त्रोक्ता आरोहन्त्यविवादतः ॥१२८॥ उस समय तो निर्विकारता, असंगता, नित्यता, स्वप्रकाशता, एकता, तथा पूर्णता नामक उदार धर्म; जिन का कि शास्त्रों में वर्णन आता है, झटपट बुद्धि में बैठ जाते हैं । फिर उसे इनके विषय में विवाद या संशय नहीं रहता [ जब तक निरोध का लाभ नहीं हो जाता,तब तक निर्विकारता,असंगता, स्वप्रका- शता आदि का सच्चा अर्थ किसी की कल्पना में आता ही नहीं । इन शब्दों के अन्दर जो अनन्त खजाना भरा पड़ा है वह उक्त साधन किये बिना किसी को दीखता ही नहीं । ] योगाभ्यास स्त्वेतदर्थोऽमृतविन्दादिषु श्रुतः । एवं च दृष्टद्वारापि हेतुत्वादन्यतो वरम् ॥१२९॥ अमृतबिन्दु आदि उपनिषदों में उसी [निर्विकल्प समाधि को सिद्ध करने] के लिये योगाभ्यास का करना बताया है । [क्योंकि निर्गुण उपासना प्रत्यक्षज्ञान के सब से अधिक निकट है । उससे एक यह दृष्ट फल भी होता है कि निर्विकल्प समाधि का लाभ हो जाता है] यों यह निर्गुण उपासना सगुण उपासना से बहुत ऊँची वस्तु है । यह निर्गुणोपासना दृष्ट [ निर्विकल्प- समाधिलाभ] और अदृष्ट[ज्ञान का साधन होने से]दो प्रकारों से सगुणोपासना आदियों से श्रेष्ठ वस्तु है ।