भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

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ध्यानदीपप्रकरणम् ३९७ आत्मा केवल मोह के आवरण में छिपा रहता है, उनके लिये तो 'सांख्य' नाम का तत्व विचार ही मुख्य उपाय है । क्योंकि उनको उसीसे झटपट सिद्धि मिल जाती है । यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं तद्योगैरपि गम्यते । एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति ॥१३४॥ [योग और सांख्य (उपासना और तत्वज्ञान) दोनों ही तत्वज्ञान के द्वारा मुक्ति को दे देते हैं। यह बात गीता में भी कही गयी है । ] कि—सांख्यमार्गी लोग जिस पद को पाते हैं योगमार्गी लोग भी वहाँ पहुँच जाते हैं। जो ज्ञानी सांख्य और योग को फल में एक समझ लेता है—इनमें भेद नहीं जानता है, वही शास्त्र के मर्म का जानने वाला है। तत्कारणं सांख्ययोगाधिगम्य मिति हि श्रुतिः । यस्तु श्रुते र्विरुद्धः स आभासः सांख्ययोगयोः ॥१३५॥ [ श्वेताश्वतर श्रुति में भी कहा है कि ] इस जगत् का जो मूल कारण है,वह सांख्य या योग किसीसे भी जाना जासकता है । आज कल 'सांख्य और योग' नामसे प्रसिद्ध शास्त्रों में जो बहुत सी बातें श्रुति के विरुद्ध दीख पड़ती हैं वे 'सांख्य' या योग नहीं है। वे तो 'सांख्या-भास' 'योगाभास' हैं। [आभास की बाधा जैसे होजाती है वैसे ही उनकी भी बाधा होजायगी ] उपासनं नापि पक्वमिह यस्य परत्र सः । मरणे ब्रह्मलोके वा तत्वं विज्ञाय मुच्यते ॥१३६॥ इस जन्म में जिस की उपासना ( योग ) परिपक्व न हो चुकी हो, वह आगे चल कर या तो मरते समय या ब्रह्मलोक में पहुँच कर, तत्व को जान जाता है और मुक्त हो जाता है।