पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें३९८ पञ्चदशी [उपासक तत्वज्ञान होने से पहले बीच में ही मर जाय तो भी मोक्ष से वंचित नहीं रह जाता है ] । यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तं तमेवैति यच्चित्तस्तेनं यातीति शास्त्रतः ॥१३७॥ यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरं तं तमेवैति ( प्र. ८-६) प्राणी अपने मरण काल में जिस जिस भाव को स्मरण करके शरीर को छोड़ता है, उसी उस भाव को प्राप्त हो जाता है। यच्चित्तस्तेनैव प्राणमायाति प्राणस्तेजसा युक्तः सहात्मना यथा संक- ल्पितं लोकं नयति ( प्र. ३-१०) [मरते समय जैसा चित्त अर्थात् संकल्प होता है, मरते समय जिस देवता मनुष्य पशु पक्षी और वृक्ष आदि के शरीर को अच्छा मान लेता है, उस संकल्प से वह अपनी सब इन्द्रियों के साथ मुख्य प्राण में आ जाता है अर्थात् तब केवल प्राण व्यापार चलता है। इन्द्रिय व्यापार रुक जाता है। वह प्राण तेज अर्थात् उदान से युक्त हो कर भोक्ता को भी संकल्पानुसारी लोक में ले जाता है। कर्म करते समय जैसे संकल्प रहे हैं मरते समय वे वासना रूपसे प्रकट होते हैं। अगले जन्म में उन ही वासनाओं का शरीर बन जाता है। मरण के बाद जैसा शरीर मिलना होता है, वैसी ही वासनायें होती हैं और वे ही योनियां मुमूर्षु को दीखा करती हैं] ऊपर के गीतावाक्य तथा इस श्रुति के कथनानुसार मरते समय के ज्ञान से मुक्ति मिलने की बात समझ में आती है। अन्त्यप्रत्ययतो नूनं भाविजन्म, तथा सति । निर्गुणप्रत्ययोऽपि स्यात् सगुणोपासने यथा ॥१३८॥