पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 422, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ें४०० पञ्चदशी ज्ञान ही मोक्ष का साधन है [ हम मानस क्रिया-रूपी निर्गुणोपासना को साक्षात् मुक्ति का साधन नहीं कहते हैं ] अविमुक्तोपासना [ भ्रुकुटी में वैश्वानर की उपासना ] से तारक ब्रह्म का ज्ञान जैसे हो जाता है [ ऐसे ही निर्गुणो- पासना से मूलाविद्या को हटा देने वाली बुद्धि उत्पन्न हो जाती है ] । सोऽकामो निष्काम इति ह्यशरीरो निरिन्द्रियः। अभयं हीति मुक्तत्वं तापनीये फलं श्रुतम् ॥१४१॥ सोऽकामो निष्कामः आप्तकाम आत्मकाम अशरीरो निरिन्द्रियः अभयं वै ब्रह्म भवति इत्यादि वाक्यों के द्वारा तापनीय उपनिषत् में मोक्ष को निर्गुणोपासना का फल बताया है । उपासनस्य सामर्थ्याद् विद्योत्पत्तिर्भवेत् ततः । नान्यः पन्था इति ह्येतच्छास्त्रं नैव विरुध्यते ॥१४२॥ नान्यः पन्था विद्यतऽयनाय (श्वे. ३-८) यह शास्त्र कहता है कि ज्ञान के सिवाय मुक्ति का दूसरा रास्ता ही नहीं है । उपासना के सामर्थ्य से भी ज्ञान की उत्पत्ति हो जाती है और ज्ञान से मुक्ति हो जाती है । यों नान्यः पन्था वाले शास्त्र का विरोध नहीं होता । निष्कामोपासनान्मुक्ति स्तापनीये समीरिता । ब्रह्मलोकः सकामस्य शैब्यप्रश्ने समीरितः ॥१४३॥ तापनीय उपनिषत् में निष्कामोपासना से मुक्ति मिलने की बात कही है । शैब्यप्रश्न में यह बात कही गयी है कि सकामो- पासना करने वाले को ब्रह्मलोक मिलता है ।