पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)
Panchadashi by Swami Vidyaranya
स्वामी विद्यारण्य द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)
पृष्ठ 423, कुल 726 में से
संदर्भ में पढ़ेंध्यानदीपप्रकरणम् ४०१ य उपास्ते त्रिमात्रेण ब्रह्मलोके स नीयते । स एतस्माज्जीवघनात् परं पुरुषमीक्षते ॥१४४॥ शैव्य प्रश्न में यह बात कही गयी है कि जो इस परम पुरुष की उपासना त्रिमात्र ओंकार से करता है, वह ब्रह्मलोक में ले जाया जाता है । उसके अनन्तर वहीं पर यह भी कहा गया है कि— ब्रह्मलोक में पहुँचा हुआ वह उपासक, इस जीवघन [ अर्थात् जीवों की समष्टि इस हिरण्यगर्भ ] से भी ऊंचे दर्जे के उपाधि-रहित चैतन्य-रूपी परमात्मा का साक्षात् वहीं कर लेता है । अप्रतीकाधिकरणे 'तत्क्रतुन्याय' ईरितः । ब्रह्मलोकफलं तस्मात् सकामस्येति वर्णितम् ॥१४५॥ 'अप्रतीकालम्बनानयतीति बादरायणः (ब्रह्म ४-३-१५) उभयथा दोषात्तत्क्रतुश्च' इन दोनों सूत्रों में व्यास मुनि ने कहा है कि— अपनी अपनी कामना के अनुसार ही फल प्राप्त होता है । इस कारण सकाम लोगों के ब्रह्मलोक पाने की बात कही है । [ सूत्रार्थ = प्रतीकोपासना न करने वाले उपासकों को अमानव पुरुष ले जाता है ऐसा बादरायण आचार्य मानते हैं । किन्हीं को ले जाता है किन्हीं को नहीं ऐसी दोनों बात मानने में कोई दोष नहीं है । क्योंकि यह सब संकल्प पर निर्भर करता है ] निर्गुणोपास्तिसामर्थ्यात् तत्र तत्त्वमवेक्षते । पुनरावर्तते नायं कल्पान्ते च विमुच्यते ॥१४६॥ [ सकाम निर्गुणोपासक को तत्त्वज्ञान होने का कारण यह है कि ] निर्गुणोपासना के सामर्थ्य से ब्रह्मलोक में ही उसे तत्त्व-