भारतकोश
पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

पञ्चदशी (हिन्दी व्याख्या सहित)

Panchadashi by Swami Vidyaranya

स्वामी विद्यारण्य द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished726 पृष्ठ

पृष्ठ 424, कुल 726 में से

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पृष्ठ 424

४०२ पञ्चदशी ज्ञान हो जाता है। ऐसा पुरुष फिर इस मर्त्यलोक में लौटकर नहीं आता। जब कल्प का अन्त होने लगता है तभी वह हिरण्य- गर्भ के साथ मुक्त हो जाता है । प्रणवोपास्तयः प्रायो निर्गुणा एव वेदगाः । क्वचित् सगणताप्युक्ता प्रणवोपासनस्य हि ॥१४७॥ वेद में प्रणव की जितनी भी उपासनायें हैं, वे प्रायः सब की सब निर्गुण ही हैं । कहीं कहीं एकाध सगुणोपासना भी आती है । परापरब्रह्मरूप ओंकार उपवर्णितः । पिप्पलादेन मुनिना सत्यकामाय पृच्छते ॥१४८॥ पिप्पलाद मुनि ने सत्यकाम के प्रश्न के उत्तर में परापर ब्रह्मरूप दो प्रकार का ओंकार बताया है । [उसी को ओंकार की निर्गुण और सगुणोपासना का प्रमाण समझना चाहिए ।] एतदालम्बनं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् । इति प्रोक्तं यमेनापि पृच्छते नचिकेतसे ॥१४९॥ कठोपनिषत् में यम ने भी नचिकेता को यही उत्तर दिया है कि इस ओंकाररूपी आलम्बन [सहारे] को जानकर जो पुरुष जो चाहता है उसे वही मिल जाता है । [यम के उत्तर से भी प्रणवोपासना दो तरह की पायी जाती है । ] इह वा मरणे वास्य ब्रह्मलोकेऽथवा भवेत् । ब्रह्मसाक्षात्कृतिः सम्यगुपासीनस्य निर्गुणम् ॥१५०॥ [प्रकरण का तात्पर्य तो इतना ही है कि] जो निर्गुण की किसी तरह की भी उपासना भले प्रकार कर लेता है उसको इस लोक में या मरते समय अथवा ब्रह्मलोक में जाकर ब्रह्म का साक्षात्कार हो ही जाता है । [ वह होने से रुकता नहीं ]

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